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कलर फुल होली : कुदरत भी फाल्गुन पर देती थी सालभर के लिए रंगों का उपहार
रंग से चमड़ी को कोई नुकसान नहीं होता था
यह रंग हालांकि महंगा होता था, लेकिन कई लोग इस रंग की कुछ बूंदे पानी में डाल कर उस पानी से होली भी खेलते थे। रंग पूरी तरह प्राकृतिक होने के कारण न तो इससे चमड़ी को कोई नुकसान होता था और न ही पेट में जाने पर। ऐसे में जब तक बाजार में केमिकल के रंग नहीं आए तब तक पुराने लोग इसी प्रकार प्राकृतिक रूप से तैयार होने वाले रंगों का इस्तेमाल होली हो या कपड़ों की रंगाई सभी में काम लेते थे।
87 वर्षीय पूर्व विधायक हंसराज शर्मा ने बताया कि होली के दस दिन पहले और पंद्रह दिन बाद तक यहां रहने वाले छीपा समाज की महिलाएं सुबह जंगल में जाती थी और दोपहर बाद तक आती थी। इस दौरान वे जंगल में खड़े छीले के पड़ों से एवं नीचे गिरे लाल फूलों को जमा करती थी और उसकी पोट बना कर घर लाती थी। बाद में उसे घर की छतों एवं खुली जगह पर कई दिनों तक सुखाया जाता था। बाद में उसे कूट कर पीसा जाता था। जब वह पाउडर के रूप में तैयार हो जाता तो उसे उबाल कर उसमें से रंग निकाला जाता था। यह रंग बहुत चमकीला तो होता ही था, साथ ही इसके छापे इतने सुंदर होते थे कि उस समय उस कपड़े को कैसूला के छापे के नाम से बाजार में बेचा जाता था।
कैसे बनाते थे कैसूला के फूलों से चटख रंग
पलाश के पेड़ों पर लाल फूलों से ही तैयार होता था छापे व होली पर लगाया जाने वाला रंग
सवाई माधोपुर | जब केमिकल का प्रचलन नहीं था, तब केवल प्रकृति ही वह साधन थी जहां से हर जरूरत की चीज जुटाई जाती थी। ऐसा नहीं हैं कि होली का इंतजार केवल रंग लगाने एवं उड़ाने के लिए किया जाता था। सामाजिक व्यवस्था में एक जाति ऐसी भी थी जो पूरे साल होली के दिनों का इंतजार करती थी। उनको इंतजार होता था, होली के समय कैसूला के फूलों का। रणथंभौर के जंगलों में लाखों की संख्या में खड़े कैसूला (छीला, ढाक, पलाश) के पेड़ों पर इस ही समय सभी पत्ते झड़ने के साथ ही उनकी हर डाल लाल रंग के फूलों से लदी दिखाई देती है। इन्हीं फूलों को तोड़ कर सुखाने के बाद रंग तैयार किए जाते थे। इनका उपयोग छीपा समाज के लोग कपड़ों पर लगाए जान वाले छापों के लिए किया तरते थे और रंग इतना चटख और टिकाऊ होता था कि कई बार धोने के बाद भी यह रंग कपड़े से जाता नहीं था।