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खुशमिज़ाज रहना औषधीय उपचार की तरह होता है

मुझे 1970 पार के शुरुआती वर्षों में नागपुर की शीत ऋतु की सुहानी शामें याद हैं- क्योंकि ये सर्कस के दिन होते थे, जो तब...

Danik Bhaskar | Mar 31, 2018, 06:30 AM IST
मुझे 1970 पार के शुरुआती वर्षों में नागपुर की शीत ऋतु की सुहानी शामें याद हैं- क्योंकि ये सर्कस के दिन होते थे, जो तब बच्चों के लिए बड़ा मनोरंजन होता था। सर्कस से भी ज्यादा जोकर का आकर्षण था! स्टेडियम की तरह सीटों वाला पूरा टेंट अपने पालकों के साथ आए हमारे जैसे उत्साही दर्शकों से खचाखच भरा होता था। जब जोकरों का समूह एक के पीछे एक, एक-दूसरे को मारते और अगली पंक्ति में बैठे बच्चों से हालत मिलाते हाजिर होते तो माहौल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता। मुझे वे इसलिए पसंद आते, क्योंकि श्रोताओं और परिस्थिति के हिसाब से वे हर दिन अपनी पटकथा में सुधार करते जाते। वे हमेशा उत्सवी माहौल बना देते थे। बचपन में मुझे जोकर का आइडिया बहुत आकर्षित करता था, क्योंकि जोकर वे सारी परतें निकाल देते थे, जो मैंने इतने बरसों से इस तरह के आदेशों के कारण चढ़ा ली थीं, ‘तुम यह नहीं कर सकते, तुम यहां नहीं बैठ सकते, तुम यहां हंस नहीं सकते।’ ये उन कई आदेशों में से थे, जो मेरे टीचर, माता-पिता, अंकल-आंट दिया करते थे। निष्कर्ष यह है कि जोकर कोई ऐसा किरदार होता है, जो अपने आसपास की परिस्थितियों पर ज्यादा सोच-विचार किए बिना प्रतिक्रिया देता है। इसकी हम बच्चों को इज़ाजत नहीं थी, क्योंकि समाज ने हम पर कुछ पाबंदियां लगा रखी थीं। मेरी मां हमेशा कहती थीं कि जोकर का अभिनय थियेटर के सबसे कठिन स्वरूपों में से है। जब सर्कस में कोई जोकर दुखी करने वाली कोई भूमिका करता था तो मैं हमेशा रो देता था- याद हैं न महान फिल्म ‘मेरा नाम जोकर?’ किसी खुशमिज़ाज व्यक्ति को दुखी देखना कठिन होता है।

इसके अलावा यदि किसी जोकर या उसकी ‘जोकर-गिरी’ के लिए मैं रोया था तो वह ‘सदमा’ फिल्म में कमल हसन का श्रीदेवी को मनाने के लिए किया बंदरों जैसी हरकतों वाला अभिनय था, जो ट्रेन में भावहीन चेहरा लिए बैठी थीं और इसकी तरफ जरा भी ध्यान नहीं दे रही थीं, जिसने उसे ठीक किया था। मैं उस पल के लिए ‘पत्थर दिल’ श्रीदेवी से नफरत करने लगा, जबकि वह भूमिका उन्होंने अद्‌भुत ढंग से निभाई थी।

सदमा के बाद यदि किसी ‘जोकर गिरी’ ने मेरी आंखें नम की तो यह पिछले हफ्ते की ही बात है, जिसमें एक जोकर बंदरों वाली हर हरकत कर रहा था ताकि उस छोटी-सी लड़की के चेहरे पर मुस्कान आ जाए, जिसकी गर्दन पर जलने के निशान थे और उसका रोना थम ही नहीं रहा था। आखिरकार दूसरे जोकर उसके साथ आए और गाने लगे, जिसके बाद बच्ची खिलखिलाने लगी। वे ‘हॉस्पिटल क्लाउन्स’ थे और उनसे मिलना मेरे लिए नई बात थी। हंटर डोहर्टी एडम्स- जो पेच एडम्स के नाम से ज्यादा जाने जाते हैं, इसी नाम की ब्लॉकबस्टर फिल्म के कारण- ने अपने दल के जरिये रोगी की देखभाल में हास्य-विनोद को शामिल कर पूरी दुनिया में हाॉस्पिटल केयर में क्रांति ला दी। उनके दल को आज हम ‘हॉस्पिटल क्लाउन्स’ कहते हैं। हर हफ्ते चेन्नई के एक अस्पताल के शिशु रोग वार्ड में स्थानीय थियेटर ग्रुप ‘द लिटिल थियेटर’ के ‘हॉस्पिटल क्लाउन्स’ कुछ मजेदार रंगबिरंगी प्रस्तुतियां देते हैं, जिससे वहां का माहौल जिंदादिल हो जाता है और प्रसन्नता भरी मुस्कानें छा जाती हैं। बच्चे न सिर्फ इन तड़क-भड़क से भरे अद्‌भुत पात्रों के प्रति गर्मजोशी दिखाते हैं बल्कि अपने बिस्तर से बाहर आने का साहस भी जुटा लेते हैं और इस तरह जल्दी ठीक हो जाते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि लोग हंसी को सर्वश्रेष्ठ औषधि मानते हैं। हममें से कई लोगों के लिए खुद पर जोक कहना कठिन होता होगा पर कभी-कभार इसे आजमाने में क्या हर्ज है।

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in