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राजनीति सेवा नहीं, इसलिए खत्म हो रही है सादगी

पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के पुत्र अनिल शास्त्री ने कहा भास्कर न्यूज |भरतपुर/बयाना राजनीति में...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 03, 2018, 06:30 AM IST

पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के पुत्र अनिल शास्त्री ने कहा

भास्कर न्यूज |भरतपुर/बयाना

राजनीति में सादगी के प्रतीक रहे पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री के पुत्र तथा कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य अनिल शास्त्री का कहना है कि राजनीति अब सेवा नहीं रही, बल्कि चुनाव तक सिमट गई है। और चुनाव सिर्फ पैसे और बाहुबल का रह गया है। इस कारण समाजसेवा को ध्येय रखकर राजनीति में आने वाले लोग हाशिये पर आ गए हैं। इसलिए राजनीति और राजनीतिज्ञों के जीवन से सादगी मिटती जा रही है। इसके लिए बहुत कुछ जिम्मेदारी चुनाव प्रणाली भी है, किंतु मेरा मानना है कि देर-सवेर इसमें बदलाव आएगा। क्योंकि मीडिया बहुत सशक्त होता जा रहा है, जो बदलाव के लिए मुहिम चला रहा है। सरकारों के तमाम निर्णयों की दमदारी से खिलाफत मीडिया और सोशल मीडिया ही कर रहा है। इसलिए उम्मीद है कि जल्द परिवर्तन आएगा। शास्त्री सोमवार को भरतपुर आए थे। इस मौके पर भास्कर ने उनसे खास बात की।

प्र. जय जवान-जय किसान की क्या स्थिति है

उ. भाजपा राज में किसान और जवान की स्थिति ठीक नहीं है। आप देख ही रहे हैं। एमपी में किसानों का एनकाउंटर किया गया। किसान आत्महत्या कर रहे हैं। सैन्य बजट घटाया जा रहा है। जबकि चीन और पाकिस्तान की हरकतों को देखते हुए हथियार एवं अन्य सुविधाओं से सेना को मजबूत किए जाने की आवश्यकता है।

प्र. कांग्रेस राज में भी किसान-जवान की समस्याएं बनी रहीं।

उ. कांग्रेस पार्टी ने किसानों और जवानों के लिए जितना किया उतना किसी ने नहीं किया। कांग्रेस राज में फसल का सपोर्ट प्राइज घोषित किया गया। पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी जी संसद में समय-समय पर किसानों की मांगों को उठाते रहे हैं।

प्र. एससी-एसटी एक्ट में गिरफ्तारी को लेकर जो बवाल चल रहा है उस पर क्या कहना है

उ. मैं सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करता हूं। अगर कोई आपका पक्ष है तो उसे न्यायिक प्रक्रिया के तहत पेश किया जाना चाहिए। ऐसे आंदोलनों से तो आमजन को परेशानी होती है।

प्र. जाति की राजनीति का तोड़ क्या है

उ. विकास का मुद्दा जाति की राजनीति को तोड़ सकता है। क्योंकि यह जाति और धर्म से परे होता है। वैसे भी जातिगत राजनीति चुनावी हथकंडा होती है। अनेक बार पार्टियां वोटों की राजनीति के कारण महत्वपूर्ण वर्गों की गलत बातों को भी मान लेती हैं। यद्यपि मैं इसमें विश्वास नहीं करता हूं।

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