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मोदी का फोकस गरीबों पर, धनी वर्ग में भय

हम कहते रहते हैं कि दिल्ली और मुंबई दो सम्प्रभु गणराज्यों जैसे हैं, जिन्हें अभी एक-दूसरे से राजनयिक रिश्ते बनाने...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 03, 2018, 06:30 AM IST

हम कहते रहते हैं कि दिल्ली और मुंबई दो सम्प्रभु गणराज्यों जैसे हैं, जिन्हें अभी एक-दूसरे से राजनयिक रिश्ते बनाने हैं। दोनों की तुलनात्मक शक्ति एक बदलते कारक पर निर्भर है : दिल्ली में मौजूद सरकार की शक्ति। ये दो शहर तो केवल रूपक हैं। एक राजनीति को प्रदर्शित करता है अौर दूसरा विरासत को। पुरानी भारतीय उद्यमशीलता और वित्तीय जगत की विरासत। जो अब भी काफी कुछ वैवाहिक, सांस्कृतिक, जातीय, करारों और एलओयू से जुड़े मित्रों-परिवारों के छोटे से सिस्टम से नियंत्रित है। यह भारत के स्थायी पूंजीवादी-वित्तीय प्रतिष्ठान जैसा है। यह नहीं बदलता।

सत्ता तो दिल्ली में बदलती है। यदि हम 1989 को भी कट-ऑफ माने (जब भारत में एक दल का स्थायी शासन खत्म हुआ) तो दिल्ली में अब आठवां प्रधानमंत्री है। सत्तारूढ़ दल अथवा गठबंधन धुर धर्मनिरपेक्ष वाम और धुर दक्षिणपंथ के बीच झुलता रहा है। मंुबई आमतौर पर किसी भी राजनीतिक प्रतिष्ठान में अपना रास्ता खोज सकती है। इसलिए यह दूसरे गणराज्य के ‘आंतरिक मामलों में’ जरूरत से ज्यादा दखल देने की चिंता नहीं करती। इसमें निर्णायक मोड़ 2011 में आया, जब कॉर्पोरेट इंडिया ने तय किया कि अब सत्ता परिवर्तन का वक्त है। तीन बातें थीं। एक, कुछ बेहतर उद्योगपति नीतिगत ठहराव से तंग आ गए थे। अरबों रुपए उधार लेकर जमीन पर प्लांट लगाने के बाद पर्यावरण मंजूरी या फ्यूल लिंकेज से इनकार जैसी बातों से परेशान थे। उन्हें बिज़नेस हितैषी सरकार चाहिए थी। दो, और मैं इसे पूरी सावधानी के साथ कह रहा हूं, जहां से भारत का पुराना पूंजीवाद आता है, वहां मुस्लिमों के लिए ज्यादा लगाव नहीं बचा है।’ तो क्या हमें ऐसी सरकार मिल सकती है, जो बिज़नेस के हित में हो और मुस्लिमों को उनकी जगह भी दिखा सके? इसलिए तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि अब वह विकल्प उपलब्ध था। मंुबई को लगा कि इसे दिल्ली के लिए अपना आदमी मिल गया है। वह जश्न चार साल बाद संदेह और भय में बदल गया है। पुराने लोग बताते हैं कि यह डर वीपी सिंह के छापामारी के राज जैसा है। हालांकि, किसी पर अभी तक छापा नहीं मारा गया है।

एक स्तर पर तो यह ठुकराए गए प्रेमी की कुंठा है। यह वह सरकार नहीं है, जिसका वादा नरेंद्र मोदी ने हमसे किया था। मोदी सरकार के साथ एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक तथ्य यह है कि दिल्ली में अब ज्यादातर लॉबिइंग नहीं चलती। उनकी सरकार का इस पर यकीन नहीं है कि उसे किसी का कुछ चुकाना है। बड़े बिज़नेस इसे पसंद नहीं करते। ये उन्हें वैसे ही खुले द्वार व दिल वाला चाहते थे जैसे वे गुजरात में थे। लेकिन, सत्ता में आने के बाद मोदी अपनी राजनीति वहां ले गए जहां वोट हैं। अब बिज़नेसमैन का महत्व नहीं है। कठोर सच यह है कि हमारे आर्थिक इतिहास में, कम से कम 1991 के बाद से बड़े बिज़नेस इतने शक्तिहीन कभी नहीं थे। गरीबों के मसीहा और भ्रष्टाचार विरोधी योद्धा के रूप में मोदी द्वारा अपने राजनीति को नया रूप देने का परिणाम यह हुआ कि कर विभागों को लक्ष्य दिए गए हैं और साथ में पहले से कहीं अधिक अधिकार। औद्योगिक संगठन और सीआईआई, एफअाईसीसीआई और एसोचैम का ज्यादा प्रभाव नहीं रहा है।

कॉर्पोरेट इंडिया के स्वभाव में ही नहीं है कि वह किसी सरकार की तारीफ करने के अलावा उसके बारे में कुछ कहे। कुछ लोगों ने नोटबंदी की फुसफुसाकर आलोचना की होगी लेकिन, दिल्ली से आए दोस्ताना कॉल ने उनकी बोलती बंद कर दी। अभी भारतीय बिज़नेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती ठप पड़ी ऋण व्यवस्था है। हालांकि, इसके लिए इस सरकार को ज्यादा दोष नहीं दिया जा सकता, बट्‌टे खाते के ज्यादातर ऋण यूपीए सरकार के कार्यकाल में दिए गए थे खासतौर पर 2009-12 के वर्षों में।

व्यवस्था की सड़न कम से कम तीन साल से पता थी। वक्त पर समाधान के रास्ते में कई चीजें आ गईं। एक, भारतीय रिजर्व बैंक के शीर्ष पर बदलाव। नए गवर्नर ठीक से जम पाते इसके पहले ही नोटबंदी का झटका लगा। अभी इससे उबरे भी नहीं थे कि जीएसटी लागू हो गया। व्यवस्था इनमें से किसी भी बदलाव के लिए तैयार नहीं थी और इसीिलए वह इनसे निपटने में ही पूरी तरह मशगुल हो गई। बट्‌टे खाते के ऋण की समस्या का समाधान सरकार के आखिरी साल के लिए छोड़ दिया गया। उद्योगों के स्तर पर भय और मनोबल का गिरना वास्तविक है और तब एकदम अनुचित है, जब कॉर्पोरेट जगत को मुनाफा व बढ़ती मांग दिख रही है। ज्यादा वक्त नहीं हुआ जब स्टील की हालत पतली थी, अब उछाले मार रहा है और यही हाल सीमेंट का है। पहले ‘डर्टी डज़न’ की दिवालिया प्रक्रिया ठीक चल रही है और बैंकों को काफी पैसा वापस आता दिख रहा है खासतौर पर स्टील कंपनियों से। इसके साथ सार्वजनिक क्षेत्र की 21 में से 12 बैंकों की हालत इतनी खराब है कि आरबीआई उनके द्वारा दिए जा रहे ऋण पर कड़ी निगाह रख रहा है। वे जो ऋण दे सकते हैं, हिचक रहे हैं इस डर से कि रिटायर होने के लंबे समय बाद कहीं सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय उनके पीछे न पड़ जाए।

इस माहौल में बैंक, ऋण लेने वाला और आरबीआई तक हर कोई जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा है। कोई जोखिम नहीं लेना चाहता और आरबीआई तो सबसे कम। धनी बड़े लोगों का डर दिवालिया होना नहीं, पुलिस है। पहले विजय माल्या और फिर नीरव मोदी-मेहुल चौकसी की जोड़ी ने कॉर्पोरेट इंडिया को आर्थिक गड़बड़ियों के अपराधीकरण की झलक दिखा दी है। भय वास्तविकता से नहीं, भ्रम से पैदा होते हैं।

सबसे लोकप्रिय मौजूदा भ्रम यह है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की हालत खस्ता है। मोदी सरकार को भी चुनाव के पहले भ्रष्टाचार विरोधी छवि पुख्ता करने के लिए निजी क्षेत्र से कुछ बड़े शिकार चाहिए। तो अगली बार तलवार किसके गले पर चलेगी? उस दृष्टि से आईसीआईसीआई-वीडियोकॉन की कहानी अहम है। व्हिसलब्लोअर का 2016 का पत्र पावर-वॉट्सअप पर हफ्तों से चल रहा है। कई लोगों को राहत मिली होगी कि अब यह खुले में है और अब सारे पक्ष अपनी बात रख सकेंगे। जैसा कि हमने कहा, भय आमतौर पर वास्तविकता पर आधारित नहीं होते लेकिन, वे वास्तविक हो सकते हैं, जैसे यह है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)



शेखर गुप्ता

एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

Twitter@ShekharGupta

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