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स्मिथ व उनके साथियों ने हमें आईना दिखाया है

ऑस्ट्रेलिया के कप्तान स्टीव स्मिथ पर जब सफाई देने के लिए जोर दिया गया कि उनकी टीम ने खुले आम गेंद से छेड़छाड़ करने की...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 30, 2018, 06:50 AM IST

स्मिथ व उनके साथियों ने हमें आईना दिखाया है
ऑस्ट्रेलिया के कप्तान स्टीव स्मिथ पर जब सफाई देने के लिए जोर दिया गया कि उनकी टीम ने खुले आम गेंद से छेड़छाड़ करने की कोशिश क्यों की तो उन्होंने कहा हम ‘डेस्पीरेट’ थे यानी हर कीमत पर दक्षिण अफ्रीका को रोकने के लिए तड़प रहे थे। यह स्वीकारोक्ति न सिर्फ कलंकित ऑस्ट्रेलियाई कप्तान बल्कि समकालीन समाज की मनस्थिति का निचोड़ है। ‘जीतने’ और ‘किसी भी कीमत पर जीतने’ के बीच के बारीक अंतर को न सिर्फ क्रिकेट के मैदान पर बल्कि समाज में भी मिटा दिया गया है।

आधुनिक खेल पागल कर देने वाली प्रतियोगी दुनिया के चरित्र का उदाहरण है, जहां साधनों से अधिक साध्य का महत्व है। खेल का रिश्ता अब उस ओलिंपिक भावना से नहीं रहा, जिसे आधुनिक ओलिंपिक खेलों के संस्थापक पीयरे डी कोबर्टिन ने यह कहकर परिभाषित किया था, ‘ओलिंपिक खेलों में जीतना नहीं, भाग लेना महत्वपूर्ण है, जीवन में जीत नहीं बल्कि संघर्ष महत्वपूर्ण है; जीतना नहीं बल्कि अच्छी तरह लड़ना जरूरी है।’ ओलिंपिक का ध्येय वाक्य शौकिया एथलीटों के बीते हुए जमाने का है, जहां खेल मुख्यत: फुर्सत की गतिविधि थी। उसी तरह यह धारणा भी गलत है कि क्रिकेट ‘जेंटलमेन्स गेम (भद्रजनों का खेल)’ है। यह खेल के औपनिवेशक भूतकाल से आया बनावटी विचार है, जहां ‘साम्राज्य’ खेल के नियमों से चलने का दावा करता था। 21वीं सदी में खेल एक स्तर पर अत्यधिक प्रतियोगी राष्ट्रवाद है, राष्ट्रों के बीच ‘युद्ध’, जहां खेल में राष्ट्रीय गौरव निहित है। कम्युनिस्ट व्यवस्था की श्रेष्ठता साबित करने की इच्छा शीत युद्ध के जमाने में सोवियत ब्लॉक के एथलीटों को सुनियोजित डोपिंग की ओर ले गई। वैश्विक मान्यता की इसी तड़प ने चीन को ओलिंपिक सफलता पर केंद्रित होकर महान दीवार तोड़ते देखा। और शायद ऑस्ट्रेलिया को प्रमुख क्रिकेटीय शक्ति साबित करने का जुनून स्मिथ की टीम को उस ओर ले गया, जिसे दक्षिण अफ्रीका की जीत रोकने के लिए की गई पूर्व निर्धारित धोखाधड़ी ही कहा जा सकता है।

सीमित इतिहास वाले और भौगोलिक रूप से अलग-थलग ऑस्ट्रेलिया जैसे देश के लिए खेल उसकी राष्ट्रीय पहचान स्थापित करने का सर्वश्रेष्ठ जरिया है। इस इच्छा की अभिव्यक्ति है कि उन्हें शेष विश्व के ‘समान’ देखा जाए। यह स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास वाला देश नहीं है बल्कि ऐसा देश है, जो पश्चिमी जगत से आने वाले आप्रवासियों की लहरों से निर्मित हुआ है। ऑस्ट्रेलिया को अब भी ऐसा देश होने की छवि मिटाने में कठिनाई होती है, जो वहां की मूल आदिवासी आबादी से बर्बर व्यवहार करने वाले ‘अपराधियों’ से बना है। बीसवीं सदी के महानतम ऑस्ट्रेलियाई के लिए हुए जनमत संग्रह में क्रिकेट की किंवदंती बन चुके डॉन ब्रेडमैन आम सहमति से विजेता बने थे। शायद ही किसी देश में खिलाड़ी को यह सम्मान मिला हो : ऑस्ट्रेलिया पर खेलप्रेम का जुनून है। कामयाबी के लिए उनकी भूख की यही व्याख्या है। एक दूसरे स्तर पर पेशेवर खेल का रिश्ता न सिर्फ व्यक्तिगत श्रेष्ठता से है बल्कि ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ की क्रूर लड़ाई से है, अरबों डॉलर की इंडस्ट्री द्वारा पेश ख्याति और विपुल धन अर्जित करने से है। इसी ने शायद मारिया शारापोवा जैसी चैम्पियन टेनिस खिलाड़ी को भटका दिया, क्रिकेटरों को मैच ‘फिक्स’ करने, बेन जॉनसन को ‘प्रदर्शन बढ़ाने वाली’ दवा लेने पर मजबूर किया। खेल का यह काला पहलू सेलेब्रिटी दर्जे की चमक-दमक व आईपीएल जैसे तमाशे के पीछे छिप गया, जहां खिलाड़ियों से हर दिन रोबोट जैसा प्रदर्शन करने की अपेक्षा रहती है। लेकिन, जरा परदा उठाइए और खेल के ‘देवता’ प्राय: मिट्‌टी के पैरों वाले निकलते हैं : ऊंचे दर्जे के एथलीट लेिकन, आम लोगों जैसी सारी असुरक्षाओं और चिंताओं से ग्रस्त।

स्मिथ और मुख्य ‘षड्यंत्रकारी’ डेविड वार्नर को पैसे की जरूरत नहीं है : दोनों बेशक सबसे धनी क्रिकेटरों में शामिल हैं। उन्हें ख्याति और मान्यता की भी जरूरत नहीं है : स्मिथ की रन बनाने के प्रदर्शनों की ब्रैडमैन से तुलना की जाने लगी हैं। लेकिन जब दक्षिण अफ्रीकियों ने उन्हें पीछे धकेला तो उनके अहंकार को चोट पहुंची। इस हेकड़ी के कारण ही उन्हें लगा कि वे अपनी इन हरकतों से बच निकलेंगे। फिर चाहे आज के मीडिया युग में अक्षरश: दर्जनों कैमरे हर गतिविधि पर निगाह रखते हैं। सफलता के लिए बेचैनी के साथ अजेय होने की भावना एक खतरनाक संयोग है। खेद की बात है कि सिर्फ हुनर पर निर्भर रहने की बजाय उन्होंने खेल के नियमों को तोड़ने का ‘शॉर्टकट’ अपनाया। आश्चर्य नहीं कि सामूहिक गुस्से की भावना है, खासतौर पर ऑस्ट्रेलिया में। हमारे आधुनिक नायकों द्वारा ‘धोखा’ देने की भावना। ठीक उसी तरह जैसा हम भारतीयों ने मैच फिक्सिंग कांड के पहली बार उजागर होने पर महसूस किया था। कोई भी अपने रोल मॉडल्स का इस रूप में भांडाफोड़ नहीं चाहता। खेल की ‘शुद्धता’ में अडिग भरोसा और अत्यधिक प्रतिभाशाली खिलाड़ी ही लाखों लोगों को स्टेडियम की ओर आकर्षित करते हैं। खेल ही हमारे सपनों, उम्मीदों और महत्वाकांक्षाओं का चरम है, जहां से हम दुनिया को एक खुशनुमा जगह पाते हैं। जब यह दुनिया उलट दी जाती है तो गुस्सा स्वाभाविक है।

फिर भी ऐसे सामाजिक-राजनीतिक माहौल में जहां व्यवस्था को धोखा देने वालों को प्राय: पुरस्कृत किया जाता हो, कुछ प्रतिक्रियाएं खासतौर पर पाखंड और अतिशयोक्तिपूर्ण है। क्या चुनाव जीतने के लिए चाहे जो करने वाले नेता, बही-खातों में हेरा-फेरी करने वाले बिज़नेसमैन, परीक्षा में नकल करने वाले छात्र, पेशवर दायित्वों से परहेज करने वाले डॉक्टर व वकील, ‘फेक न्यूज़’ देने वाले पत्रकार आदि को कोई नैतिक अधिकार है कि वे खिलाड़ियों को खलनायक बताएं? अथवा क्या हम खेल नायकों से नैतिकता और व्यवहार के ऊंचे मानकों की अपेक्षा रखते हैं? स्मिथ और उनकी टीम के साथियों ने चाहे लाखों क्रिकेट प्रशंसकों को नीचा दिखाया हो लेकिन, उन्होंने समाज को आईना भी दिखाया है कि वह अपनी नैतिक दिशा खो चुका है।

पुनश्च : सत्तर पार के दशक में भारतीय क्रिकेट कप्तान बिशन सिंह बेदी को उनकी इंग्लिश काउंटी ने टीम से निकाल दिया, क्योंकि उन्होंने इंग्लैंड के गेंदबाज जॉन लीवर पर गेंद पर वेसलीन लगाने का आरोप लगाया था। उसके पीछे ‘श्वेत व्यक्ति धोखाधड़ी नहीं करता’ का खुद को नैतिक मानने का दंभ था। 2018 में अब हम निश्चित ही जानते हैं कि श्वेत व्यक्ति भी धोखा देता है! (ये लेखक के अपने विचार हैं।)

राजदीप सरदेसाई

वरिष्ठ पत्रकार

rajdeepsardesai52@gmail.com

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