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लीकेज और रिसाव का मौजूदा अजीब कालखंड

एक विज्ञापन फिल्म में अमिताभ बच्चन बताते हैं कि घरों में पांच जगह से पानी रिस सकता है। ‘रिसने’ से अधिक ‘लीकेज’...

Dainik Bhaskar

Mar 30, 2018, 06:50 AM IST
लीकेज और रिसाव का मौजूदा अजीब कालखंड
एक विज्ञापन फिल्म में अमिताभ बच्चन बताते हैं कि घरों में पांच जगह से पानी रिस सकता है। ‘रिसने’ से अधिक ‘लीकेज’ शब्द का प्रचलन हो रहा है। रिसाव तो भाषाअों में भी हो रहा है। परीक्षा के प्रश्न-पत्र लीक हो जाना ताज़ा खबर है। कुछ विषयों का पुन: इम्तििहान होगा। परीक्षा का मौसम माताओं पर भारी पड़ता है। छात्र को जगाए रखना और तंदुरुस्त रखना जवाबदारी का काम है। किटी सेशन निरस्त हो जाते हैं। एक तरह से पूरा परिवार ही इम्तिहान दे रहा होता है। कुछ समय पूर्व एक सार्थक फिल्म आई थी, जिसमें माता भी उसी कक्षा में पढ़ रही है, जिसमें उसकी पुत्री पढ़ रही है। नायिका काम वाली बाई है, जो अपने परिवार के गुजारे के लिए दूसरों के घर काम करती है। वह नहीं चाहती कि उसकी बेटी भी ‘काम वाली बाई’ बने।

शिक्षा पर फिल्में बनती रही हैं। विनोद खन्ना अभिनीत ‘इम्तिहान’ अत्यंत रोचक फिल्म थी, जिसमें गुलजार के लिए एक गीत का अंश इस तरह था, ‘राहों के दिए आंखों में लिए तू बढ़ता चल।’ शांताराम की ‘बंूद जो बन गई मोती’ और ‘जागृति’ भी सफल फिल्में रही हैं। दरअसल, फिल्मकार का इम्तिहान भी हर शुक्रवार होता है और गुजश्ता सौ वर्षों में बीस प्रतिशत फिल्में ही सफल रही हैं। यह एकमात्र उद्योग है, जो इतनी अधिक असफलताओं के बाद भी जारी है, क्योंकि ग्लैमर से आकर्षित नए पूंजी निवेशक इसमें प्रवेश करते हैं। अगर आप पान की दुकान भी खोलें तो पहले कत्था बनाना सीखना पड़ता है परंतु जाने क्यों लोग फिल्म निर्माण में बिना कुछ सीखे ही आ जाते हैं। मौजूदा कालखंड लीकेज कालखंड भी कहा जा सकता है। ‘फेसबुक’ इत्यादि से डेटा लीक हो चुका है। निजता कायम रखना कठिन काम होता जा रहा है। ये जानकारियां बाजार अपने काम में ले रहा है। ग्राहक मनोविज्ञान एक नए विषय के रूप में उभरा है। इस दारुण दशा को अरसे पहले एक शायर ने भांपकर लिखा था, ‘बाजार से गुजरा हूं परंतु खरीददार नहीं हूं।’ फिल्म ‘चोरी चोरी’ में शैलेन्द्र का गीत है, ‘जो दिन के उजाले में न मिला, दिल ढूंढे ऐसे सपने को, इस रात की जगमग में डूबी मैं ढूंढ रही हूं अपने को।’

बजट की गोपनीयता कैसे कायम रह सकती है, जब उद्योगपतियों की सहूलियतों के लिए, उनसे सलाह-मशविरा करके उसे बनाया जाता है। रक्षा विभाग की गुप्त जानकारियां भी लीक हो जाती हैं। बड़ा खुल्लम खुल्ला काल है, जिसमें सिर्फ प्रेम को गुप्त रखना आवश्यक हो गया है। आदमी इस कदर बंटा हुआ जीवन जी रहा है कि कभी-कभी खुला हुआ पेन ही कमीज की जेब में लगा लेता है और स्याही रिसते हुए कमीज पर न साफ किए जाने वाला दाग बना देती है। प्राय: घरों में समय पर वासर नहीं बदलने के कारण पानी के नल से कुछ बंूदें लीक होती रहती हैं और इस अपव्यय को रोका नहीं जा रहा है। इसी तरह टीयर डक्ट अत्यधिक संवेदनशील हो तो आंख से आंसू रिसते रहते हैं। आंसू बहना मजबूरी होती है परंतु कुछ लोग इसे हथियार की तरह भी इस्तेमाल करते हैं। फिल्मों में आंसू के गिर्द ताली पड़ने वाले संवाद रचे जाते हैं जैसे आंखेें मिचमिचाते हुए राजेश खन्ना कहते हैं, ‘पुष्पा आई हेट टीयर्स’ या एक्शन हीरो कहे, ‘वह खून बहते हुए देख सकता है परंतु आंसू बहते नहीं देख पाता।’ किसी मरीज को बार-बार वॉशरूम जाना पड़ता है तो वह कहता है, ‘आई वीप थ्रू माई इन्टेस्टाइन,’ भांति-भांति के रिसाव होते हैं।

अत्यंत पुरानी कहावत है ‘मगरमच्छ का आंसू बहाना। हसरत जयपुरी का गीत है, ‘ये आंसू मेरे दिल की जुबान हैं।’ रिसाव के वृहद दायरे में आंख का रिसना भी शामिल किया जा सकता है। फिल्म कलाकार ग्लिसरीन की एक बूंद आंख में डालकर रोने-धोने का दृश्य अभिनीत करते हैं। मीना कुमारी ने कभी ग्लिसरीन का इस्तेमाल नहीं किया। वे जब चाहें आंसू बहा सकती थीं। दरअसल, अभिनय में आंसुओं को जब्त करने के प्रयास से चेहरे पर गहरा दर्द अभिव्यक्त होता है। आजकल ग्लिसरीन का उपयोग फिल्मों से अधिक राजनीति क्षेत्र में हो रहा है।

जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

jpchoukse@dbcorp.in

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