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हिंसक विरोधों से न्यायिक सर्वोच्चता का मखौल न बनाएं

करंट अफेयर्स पर 30 से कम उम्र के युवाओं की सोच कृष्ण जांगिड़, 22 राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर krishanjangid393@gmail.com...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 05, 2018, 07:00 AM IST

हिंसक विरोधों से न्यायिक सर्वोच्चता का मखौल न बनाएं
करंट अफेयर्स पर 30 से कम उम्र के युवाओं की सोच

कृष्ण जांगिड़, 22

राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर

krishanjangid393@gmail.com

कितना अज़ीब है कि दुनिया के विकासशील राष्ट्रों की श्रेणी में शामिल भारत में हर वर्ष सकल घरेलू उत्पादन के अरबों-खरबों रुपए हिंसक आंदोलनों में स्वाहा हो जाते हैं। इसी जद्‌दोजहद में वैश्विक महाशक्तियों से होड़ करने की हमारी ज़िद पीछे छूट जाती है। जातिगत, राजनीतिक या क्षेत्रीय स्वार्थ सिद्धि के लिए अक्सर ज़बरदस्ती भारत बंद कर देना आम बात हो गई है।

अभी हाल ही में दलित समुदाय द्वारा घोषित भारत बंद के दौरान देशभर में हंगामा बरपा, हजारों करोड़ों का व्यापार ठप हो गया और सबसे दर्दनाक यह कि कई लोगों की जान चली गई। उल्लेखनीय है कि एक याचिका की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने एसटी-एससी एक्ट-1989 के दुरुपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए, इसमें आरोपी की अग्रिम जमानत का प्रावधान जोड़कर संशोधन कर दिया। न्यायालय के इस निर्णय के विरोधियों ने बड़ी बेदर्दी से हमारी न्याय व्यवस्था को धता बता दिया। गौरतलब है कि न्यायिक निर्णयों में संशोधन के उपाय केवल कानूनी होते हैं। फैसले से असंतोष की स्थिति में पुनर्विचार याचिका दायर करनी चाहिए थी। उसके बाद भी सुधार याचिका का प्रावधान है तथा राष्ट्रपति के समक्ष भी अपनी बात रखी जा सकती है। न्यायिक सर्वोच्चता होते हुए भी देश में न्यायप्रणाली का सरल, सुलझा हुआ, सुव्यवस्थित रूप विद्यमान है। लोकतंत्र में वाज़िब मांग के लिए अपनी अभिव्यक्ति को विरोधस्वरूप प्रकट करने में कुछ गलत नहीं है, लेकिन भ्रांतियां फैलाकर आक्रामक विरोध करने की कोई तुक ही नहीं है। इन प्रदर्शनों के सामने हमारी कार्यपालिका का हर बार निष्क्रिय और निरीह हो जाना आश्चर्यजनक है।

लेकिन, लगता है कि देश के शीर्ष सत्ताधीश आमजन को ज़मीनी मसलों से भटकता हुआ देखकर राहत महसूस करते हैं। सरकार को चाहिए कि देश में नफरत व डर का माहौल न बनने दे, जनभावनाओं को उग्रता में बदलने से रोके। न्यायपालिका तो अपना कर्तव्य पालन बखूबी कर रही है, अब जरूरत है कार्यपालिका व व्यवस्थापिका सक्रियता से आपसी समझ व सूझबूझ द्वारा ऐसे मुद्‌दे हल करने की दिशा में कदम बढ़ाए।

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Web Title: हिंसक विरोधों से न्यायिक सर्वोच्चता का मखौल न बनाएं
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