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हमारी पुरानी परम्पराओं में छिपी है ग्लोबल पावर!

सरसरी तौर पर देखने वाले के लिए ये झोपड़ीनुमा घर दूसरों से अलग हैं। व्यवस्थित रूप से बनी ऐसी बस्तियों की ये झोपड़ियां...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 05, 2018, 07:00 AM IST

सरसरी तौर पर देखने वाले के लिए ये झोपड़ीनुमा घर दूसरों से अलग हैं। व्यवस्थित रूप से बनी ऐसी बस्तियों की ये झोपड़ियां देशभर में नीले-सफेद रंग में मिलती हैं पर पुणे के हडपसर स्थित ‘गोसावी वस्ती’ नीले व हरे रंग में पुती हुई हैं। लेकिन, नाम आपको सोच में डाल देगा, क्योंकि इसे हैप्पी फैमिली कॉलोनी कहते हैं। यहां तंग बस्ती में सार्वजनिक नल पर होने वाले झगड़ों से लेकर हर घर के टेलीविजन से जोर-जोर से आती आवाज और पड़ोसियों के गहरे संबंधों तक सब देखने को मिलेगा। ऐसी यह कॉलोनी खशुनूमा और दुखी करने वाले क्षणों का मिलाजुला रूप है।

लेकिन, नाम के अनुरूप इस हैप्पी फैमिली कॉलोनी में ज्यादातर बच्चे खुश हैं। और यदि यह बुधवार है तो फिर खुशी कई गुना बढ़ जाती है क्योंकि, पिछले तीन बुधवारों से दुनिया के विभिन्न हिस्सों से ‘आजी’ (नानी-दादी) स्काइप कॉल पर आकर उनमें शुद्ध मराठी में बात करती हैं। ये आजियां वास्तव में ‘द ग्रेनी क्लाउड’ की समर्पित कार्यकर्ता हैं। नाम से गच्चा न खाएं, ग्रेनी क्लाउड का हिस्सा होने के लिए आपको वास्तव में नानी होने की आवश्यकता नहीं है। ये नानी-दादियां फिलहाल 24 से 78 वर्ष आयु तक की हैं और इनमें महिला-पुरुष दोनों हैं।

क्लाउड की आजियां आवश्यक रूप से टीचर की भूमिका में नहीं होतीं। वे बच्चों को कहानियां सुनाती हैं, उनके सामने बड़े सवाल रखती हैं और उन विषयों पर बातें करती हैं, जो उनके लिए प्रासंगिक हों। वे प्रोत्साहित करती हैं, प्रशंसा करती हैं, मार्गदर्शन करती हैं और बच्चों के लिए ‘वर्चुअल ग्रेनी’ बन जाती हैं। वे जो शेयर करती हैं वे शिक्षा के प्रति दुनियाभर में अपनाया जा रहा ‘ग्रैंडमदर अप्रोच’ है। ये आजियां ऐसा माहौल निर्मित करती हैं, जहां बच्चे फल-फूल सकें। बच्चों को सीधे निर्देश देने के बजाय बच्चों को प्रोत्साहन देकर वे उनका मार्गदर्शन करती हैं। संक्षेप में कहें तो वे उन्हें ज़िंदगी के सबक देती हैं।

‘द ग्रेनी क्लाउड’ नानी-दादी और उनके नाती-पोतों के बीच माहौल बनाता है ताकि दुनियाभर में मित्रता के वातावरण में लर्निंग ग्रुप्स बनाए जा सकें। इस अवधारणा का विकास शिक्षा शोधकर्ता सुगाता मित्रा ने विकसित किया ताकि दुनिया में कहीं भी इंटरनेट कनेक्शन के साथ मौजूद बच्चों को दादी-नानी या मध्यस्थ द्वारा लिए गए सेशन का लाभ मिल सके। पिछले माह ग्रेनी क्लाउड की वर्ल्डवाइड डायरेक्टर डॉ. सुनीता कुलकर्णी ने मराठी में पहला ग्रेनी क्लाउड सेशन शुरू किया।

पिछले दो हफ्तों में बच्चों ने शाम का सत्र शुरू होने के साथ जोर की आवाज में ‘हेलो’ कहना और सत्र समाप्ति पर जोर से ‘बाय’ कहना सीख लिया है। उन्होंने ऐसे सवाल पूछने की हिम्मत जुटा ली है, ‘आपके पीछे सूर्य इतना कैसे चमक रहा है, जबकि यहां पुणे में तो अंधेरा है?’ और नानी कहती हैं कि टोरंटो में अभी सुबह के नौ बजे हैं। फिर वे सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती धरती की सारी अवधारणा समझाकर बताती हैं व बच्चे पूरी लगन से भूगोल का सबक सीखते हंै।

अब तक कम्बोडिया के गांवों, चिली, अर्जेंटीना, उरूग्वे, जमैका, ग्रीनलैंड, मेक्सिको, भारत, अमेरिका और ब्रिटेन के स्कूली बच्चों को इन स्त्रों का फायदा मिला है, जो 2008 में शुरू किए गए थे। अब वे लेबनान और ग्रीस में सीरियाई शरणार्थी बच्चों से जुड़ने की संभावनाओं की टटोल रहे हैं। सदियों से हमारी संस्कृति ग्रैंड पेरेन्ट्स के साथ शामिल बिताने को प्रोत्साहित करती रही है, जिसमें एक कहानी सुनाने का सत्र भी होता है। अब आप देख सकते हैं कि नाती-पोतो और ग्रैंड पेरेंन्ट्स के बीच का वह सरल संबंध अब ग्लोबल मिशन बन गया है।

फंडा यह है कि  वक्त आ गया है कि हम हमारी पुरानी परम्पराओं की ताकत को पहचानें, जिनमें ग्लोबल मिशन बनने की पूरी संभावनाएं हैं।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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