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मां के ब्लड से सैल्स फ्री डीएनए काउंट करके पता लगाया जा सकता है बच्चे में डाउन सिंड्रोम

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 02, 2018, 07:10 AM IST

हैल्थ रिपोर्टर जयपुर अब प्रेग्नेंसी के 9वें सप्ताह में ही महिला के ब्लड टेस्ट से यह पता लगाना संभव...
हैल्थ रिपोर्टर जयपुर



अब प्रेग्नेंसी के 9वें सप्ताह में ही महिला के ब्लड टेस्ट से यह पता लगाना संभव हो गया है कि बच्चा डाउन सिंड्रोम से ग्रसित होगा या नहीं या फिर बच्चे में किसी भी तरह की क्रोमोजोम एेब्नॉर्मलटीज तो नहीं होगी। यह बिना चीरफाड़ (नॉन-इन्वेजिव) वाला प्री-नैटल टेस्ट (एनआइपीटी) है, जो सैल्स-फ्री डीएनए टेस्ट भी कहलाता है। सबसे बड़ा फायदा ये है कि इसे कराने से अबॉर्शन और अन्य तरह की रिस्क भी खत्म हो जाती है। जबकि अभी तक क्रोमोजोम जनित असामान्यताएं जानने के लिए क्रायोनिक बायोप्सी यानी सीबीएस और एेम्युनोसिंटेसिस टैस्ट किए जा रहे हैं। प्रेग्नेंसी के 10 से 14वें सप्ताह में सीबीएस और 14-22वें सप्ताह में एेम्युनोसिंटेसिस टैस्ट किए जाते हैं, लेकिन इन दोनों टेस्ट में इन्वेजिव प्रोसीजर यानी गर्भनाल का एक टुकड़ा लेकर बायोप्सी की जाती है, इसलिए निडिल का इस्तेमाल करने के कारण अबॉर्शन का खतरा बना रहता है। जबकि नॉन इन्वेजिव प्री-नैटल टैस्ट में इस तरह की कोई रिस्क नहीं है। महंगा होने की वजह से उन कपल्स को यह टैस्ट करवाने की सलाह दी जाती है, जिनका पहला बच्चा डाउन सिंड्रोम या दूसरी क्रोमोजोम एेब्नॉर्मलटीज से ग्रसित है, ताकि दूसरे बच्चा इस तरह के िसंड्रोम के साथ जन्म नहीं लें। यहीं नहीं, बच्चे में क्रोमोजोम की असामान्यता मालूम होने के बाद यदि मां बच्चे को अबॉर्ट करवानी चाहती है, तो करवा सकती है।

एनआईपीटी से अबॉर्शन का खतरा नहीं रहता है, साथ ही टेस्ट की विश्वसनीयता 100 फीसदी सही मानी जाती है

मोटी गर्दन से भी डायग्नोस कर सकते हैं डाउन सिंड्राेम

यह एक प्रकार का आनुवांशिक विकार है। इस डाउन सिंड्रोम के साथ यदि बच्च जन्म लेता है तो वह मंदबुद्धि बनता है। इससे वह जिंदगी भर कोई भी खुद कर पाने में असमर्थ हो जाता है। यही नहीं, बच्चे में हार्ट प्रॉब्लम और ब्लडप्रेशर की प्रॉब्लम भी रह सकती है। इसलिए फीटस सामान्य है या नहीं। इसे जानने के लिए टीवीएस टैस्ट भी कर सकते हैं। यह टैस्ट करने के दौरान यदि बच्चे की गर्दन ज्यादा मोटी दिखाई दें तो बच्चे के डाउन सिंड्रोम से ग्रसित होने का अंदेशा लगाया जा सकता है। यह टैस्ट 10 से 13वें सप्ताह में किया जा सकता है।

एन.आई.पी.टी. और उसकी उपयोगिता

यह एक तरह का ब्लड टैस्ट है, जिसमें सैल्स फ्री डीएनए को काउंट किया जाता है। मां के ब्लड में बच्चे के डीएनए मौजूद होते हैं। एन.आई.पी.टी. से तीन तरह के गुणसूत्र विकारों क्रोमोसोम-21 यानी डाउन सिंड्रोम, क्रोमोसोम-18 यानी एडवर्ड सिंड्रोम और क्रोमोसोम-13 यानी पटाऊ सिंड्रोम का पता लगाया जा सकता है।

सैल्स-फ्री डीएनए टैस्ट

प्रेग्नेंसी के 9वें सप्ताह में टैस्ट से सामान्य और असामान्य बच्चे की जानकारी मिलेगी।

इस टैस्ट से अबॉर्शन और अन्य तरह की रिस्क भी नहीं होती।

खासियत : यह इन्वेजिव टैस्ट से जल्दी होता है। अल्ट्रासाउंड में 11 से 13 हफ्ते में, टीवीएस 10 से 13वें सप्ताह और क्वैड 14 से 22 हफ्ते में किया जाता है।

जब फीटस (भ्रूण) में किसी तरह की असामान्यता दिखाई दे। दो सप्ताह में इस टेस्ट के रिजल्ट आ जाते हैं। यह विश्वसनीय माना जाता है। इसकी रिपोर्ट नॉर्मल आने पर फॉलोअप की जरूरत नहीं पड़ती। - डॉ. नीलम जैन, गाइनीकोलॉजिस्ट, जयपुर

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Web Title: मां के ब्लड से सैल्स फ्री डीएनए काउंट करके पता लगाया जा सकता है बच्चे में डाउन सिंड्रोम
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