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कई जॉब दे सकती है ‘पेशेंट नेविगेटर सर्विस’

बीते शनिवार को मैं इस अखबार के कार्यक्रम के सिलसिले में नारायण हृदयालय के रायपुर स्थित अस्पताल गया। वहां के बाह्य...

Bhaskar News Network| Last Modified - Apr 10, 2018, 05:00 AM IST

कई जॉब दे सकती है ‘पेशेंट नेविगेटर सर्विस’
कई जॉब दे सकती है ‘पेशेंट नेविगेटर सर्विस’
बीते शनिवार को मैं इस अखबार के कार्यक्रम के सिलसिले में नारायण हृदयालय के रायपुर स्थित अस्पताल गया। वहां के बाह्य रोगी विभाग में किसी बस स्टैंड जैसी भीड़ थी। अस्पताल के प्रमुख ने मेरी अगवानी की और सीधे उन डॉक्टर महोदय के चैम्बर में ले गए, जिनसे मैं मिलना चाहता था। किंतु चैम्बर में डॉक्टर एक 70 पार के रोगी के साथ व्यस्त थे। वे उन बुजुर्ग को समझा रहे थे कि उनकी बीमारी के लिए कौन-सी मेडिकल प्रक्रियाएं करवाने की आवश्यकता है। जिस क्षण दोनों ने हमें देखा तो वे बुजुर्ग खड़े हो गए, जबकि डॉक्टर जल्दी से रोगी से फुर्सत पाने में लग गए। संयोग से मैंने और अस्पताल के प्रमुख ने एक साथ ही उन्हें कहां, ‘कोई जल्दी नहीं है, आप अपना वक्त लीजिए।’ उसके बाद डॉक्टर ने तसल्ली से अपना अधूरा काम पूरा किया। बाद में डॉक्टर ने मेरे साथ मुश्किल से दो मिनट बिताए और मैं जल्दी से चैम्बर से बाहर आ गया, क्योंकि उनके कक्ष के बाहर बहुत लंबी कतार थी।

बाहर मैंने देखा कि एक युवा उन्हीं बुजुर्ग से बहस कर रहा था। बातचीत कुछ ऐसी चल रही थी, ‘डॉक्टर ने जो कहा आप याद क्यों नहीं रखते। अब आप चाहते हैं कि मैं फिर लंबी कतार में खड़े होकर डॉक्टर से पूछूं कि उन्होंने आपको क्या बताया’? चूंकि मुझे लंबे ओपीडी गलियारे से बाहर की ओर ले जाया जा रहा था तो उनकी बातचीत की आवाज धीमी होती चली गई। मुझे ऐसा लगा कि पोता किसी कारण से देर से आया और उनके साथ डॉक्टर के पास नहीं जा पाया। अब दोनों को आगे के इलाज के संबंध में साफ-साफ कुछ भी पता नहीं था।

यह किसी एक रोगी के परिवार की कहानी नहीं हैै। डॉक्टर से समय लेना, रोगी के साथ डॉक्टर के यहां जाना, उनकी सलाह को नोट करना और उसे रोगी के साथ-साथ उनके संबंधियों को बताना, अस्पताल में भर्ती होने के बाद रोगी के साथ रहना, रिश्तेदारों को उपचार की जानकारी देना, रोगी को दवा लेने की याद दिलाना, स्वास्थ्य बीमा कंपनियों से संपर्क रखना और उनका मेडिकल रिकॉर्ड रखना ऐसे कई काम हैं, जो डॉक्टर-रोगी संबंध का हिस्सा हंै। इस सब में भ्रम बना रहता है। यह सबके साथ भले न हो मैंने जिन बुजुर्ग को देखा उनकी तरह के बुजुर्गों के लिए तो यह सच है, जिनकी याददाश्त हमारी तुलना में कमजोर होती है या जो अकेले रहते हैं अथवा जो गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं।

ऐसे लोगों को सेवा देने के लिए विकसित देशों में ‘पेशेंट नेविगेटर सर्विस’ बहुत लोकप्रिय है, जो स्वास्थ्य रक्षा सुविधाएं देने का भरोसा देती हैं। ‘ऑग्ज़ीलरी नर्स मिडवाइव्स’ चिकित्सकीय सहायता देती हैं, जबकि ग्रेजुएट वाॅलंेटियर गैर-चिकित्सकीय सहायता के लिए ‘पेशेंट नेविगेटर’ के बतौर काम करते हैं और उन लोगों को सेवा देते हैं, जो अकेले हैं या जिनके बच्चे भौगोलिक मजबूरियों अथवा व्यस्त दिनचर्या के कारण अपने बुजुर्ग पालकों के साथ नहीं आ पाते। विकसित देशों में रोगी ऐसी सेवाएं ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों स्तर पर लेते हैं।

भारत में ‘पेशेंट नेविगेटर’ के लिए बहुत संभावनाएं हैं, क्योंकि 29.4 फीसदी शहरी आबादी में 8.1 फीसदी बुजुर्ग हैं। इस 8.1 फीसदी बुजुर्गों की जो भी कुल आबादी है, उसकी 5.2 फीसदी आबादी अकेले रहती है, जबकि 45.5 फीसदी लंबी चलने वाली बीमारियों से ग्रस्त हैं। समझा जाता है कि इस क्षेत्र में 2.9 अरब रुपए का बाजार मौजूद है।

हाल ही मुझे बताया गया कि ओडिशा के एक आयुर्वेद प्रैक्टिशनर स्वप्नेश्वर साहू ने जून से जमशेदपुर में अपनी स्टार्ट-अप दिशा हैल्थ नेविगेशन सर्विस शुरू करने का फैसला किया है।

फंडा यह है कि  ‘पेशेंट नेविगेटर सर्विस’ भारतीय युवाओं के लिए पूरी तरह नया जॉब मार्केट खोल सकता है।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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