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साथी वैज्ञानिक के साथ वीना सहजवाला। वे मुंबई की हैं और कानपुर से बीटेक हैं।

साथी वैज्ञानिक के साथ वीना सहजवाला। वे मुंबई की हैं और कानपुर से बीटेक हैं। भारतवंशी वैज्ञानिक ने...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 10, 2018, 05:05 AM IST

साथी वैज्ञानिक के साथ वीना सहजवाला। वे मुंबई की हैं और कानपुर से बीटेक हैं।

भारतवंशी वैज्ञानिक ने माइक्रोफैक्ट्री बनाई, ये ई-वेस्ट से धातु को अलग कर प्लास्टिक को 3 डी प्रिंटर फिलामेंट में बदल देती है

ई-वेस्ट को उपयोगी मैटेरियल में बदलने वाली ये फैक्ट्री 50 वर्ग मीटर में ही लग सकती है

एजेंसी | सिडनी

दुनिया में तकनीक के साथ ही कंप्यूटर, लैपटॉप और स्मार्टफोन के ई-कचरे का अंबार लगता जा रहा है। इसका निपटारा बड़ी समस्या है। इस समस्या को हल करने लिए भारतवंशी ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिक वीना सहजवाला ने न्यू साउथ वेल्स विश्वविद्यालय (यूएनएसडब्ल्‍यू) में पहल की है। आईआईटी प्रशिक्षित वैज्ञानिक ने दुनिया की पहली माइक्रोफैक्ट्री लॉन्च की है, जो इलेक्ट्रॉनिक कचरे (ई-वेस्ट) को कीमती मटेरियल में बदल सकती है।

सेंटर फॉर सस्टेनेबल मेरियल्‍स रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी (स्मार्ट) की निदेशक और यूएनएसडब्ल्यू के मटेरियल साइंटिस्ट प्रोफेसर वीना ने बताया- ई-वेस्ट माइक्रोफैक्ट्री अपनी तरह की दुनिया की पहली फैक्ट्री है जिसकी टेस्टिंग यूएनएसडब्ल्यू में हो रही है। इस माइक्रोफैक्ट्री में कई तरह के कंज्‍यूमर वेस्ट जैसे ग्लास, प्लास्टिक और टिंबर को कमर्शियल मटेरियल व उत्पादों में बदल दिया जाएगा। माइक्रोफैक्ट्री की टेक्नोलॉजी लंबे शोध के बाद विकसित की गई है। सहजवाला ने दावा किया कि माइक्रोफैक्ट्री की क्षमता इतनी अधिक है कि यह इलेक्‍ट्रॉनिक कचरे की समस्या को बड़े स्तर पर खत्म करेगी। माइक्रोफैक्ट्री कंप्यूटर के सर्किट बोर्ड जैसे ई-कचरे से निकली धातुओं को मिश्र धातु जैसे तांबे या टिन में बदल देती है। वहीं कांच और प्लास्टिक को माइक्रोमटेरियल में बदल देती है।

ये माइक्रोफैक्ट्री साइज में इतनी छोटी है कि इस मजह 50 वर्गमीटर की जगह पर भी लगाई जा सकती है। यूएनएसडब्ल्‍यू के इस प्रोजेक्ट को ऑस्ट्रेलिया की रिसर्च काउंसिल सहयोग दे रही है। अब संस्था तैयार मटेरियल की मार्केटिंग के लिए पार्टनर तलाश रही है।

दुनिया की पहली माइक्रोफैक्ट्री में कबाड़ इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का निपटान हो सकेगा

ई-कचरा अब जलाना नहीं पड़ेगा

प्रोफेसर सहजवाला के अनुसार- माइक्रोफैक्ट्री से उस कचरे का समाधान होगा जिन्हें या तो जलाया जाता है या फिर जमीन के अंदर दबाया जाता है। ऐसे मटेरियल को माइक्रोफैक्ट्री रिसाइकिल कर दोबारा प्रयोग में लाने लायक बना देगी। जैसे- प्लास्टिक को वह इस प्रकार ढाल देगी कि उसे 3डी प्रिंटिंग के लिए स्मार्ट फिलामेंट के तौर पर कर उपयोग कर सकते हैं। वहीं, अलग हुई धातुओं को वह मैटल एलॉय में बदल देगी। यह तकनीक रोजगार भी देगी।

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