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हरि को पाने के लिए हीरे को छोड़ना होगा:आचार्य सुकुमालनंदी

भास्कर संवाददाता | हनुमाननगर महावीर दिगंबर जैन मंदिर देवली में अष्टान्हिका पर्व पर आयोजित सिद्धचक्र विधान में...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 27, 2018, 07:55 AM IST

भास्कर संवाददाता | हनुमाननगर

महावीर दिगंबर जैन मंदिर देवली में अष्टान्हिका पर्व पर आयोजित सिद्धचक्र विधान में सोमवार को इंद्र-इंद्राणियों ने 128 अर्घ समर्पित किए। आचार्य सुकुमालनंदी ने कहा कि यदि हरि यानी परमात्मा को प्राप्त करना है तो हीरे यानी भौतिक सुख का त्याग करना पड़ता है।

क्योंकि जैसे-जैसे धन की वृद्धि होगी वैसे-वैसे हम ईश्वर भक्ति से दूर होकर अपने जीवन को अशांत बना लेते हैं। आचार्य ने कहा धन की तीन गति होती है दान, भोग व नाश। यदि हमने धन का दान नहीं किया, उपयोग नहीं किया तो धन निश्चित ही विनाश को प्राप्त हो जाएगा। धन से हमें सच्चा सुख नहीं प्राप्त हो सकता है। संस्कार व संतोष ही सबसे बड़ा धन है। आचार्य सुकुमालनंदी के दीक्षित शिष्य सुलोकनंदी के अष्टाह्निका के आठ उपवास की तपाराधना चल रही है। आचार्य के भी अठाई व्रत की तप आराधना चल रही है। आचार्य के सानिध्य में मंदिर में चल रहे नौ दिवसीय सिद्धचक्र मंडल विधान में जयपुर के पंडित राहुल व पंडित जितेंद्र शास्त्री के मंत्रोच्चारण पूर्वक सौधर्म आदि इंद्र-इंद्राणियों ने पूजन में 128 अर्घ समर्पित किए। त्रिशला महिला मंडल ने भक्ति पूर्वक आचार्य की पूजा की। शाम को आरती के बाद आचार्य के नाम से बनी वेबसाइट का लोकार्पण कोटा के भक्तों द्वारा किया गया। शाम को सभा में प्रश्न मंच व नाटिका का मंचन किया गया।

शाहपुरा. सिद्धचक्र विधान मंडल में आचार्य सुकुमालनंदी से आशीर्वाद लेते श्रद्धालु।

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