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एलबीएस अस्पताल में मशीन होने के बाद भी बाहर से करवानी पड़ती है सोनोग्राफी

कार्यालय संवाददाता | शाहपुरा शहर के एलबीएस राजकीय चिकित्सालय में अस्पताल प्रशासन की सख्ती नहीं होने से...

Bhaskar News Network | Last Modified - Jun 17, 2018, 06:00 AM IST

कार्यालय संवाददाता | शाहपुरा

शहर के एलबीएस राजकीय चिकित्सालय में अस्पताल प्रशासन की सख्ती नहीं होने से सोनोग्राफी मशीन होने के बाद भी मरीजों को बाहर महंगे दामों में सोनोग्राफी की जांच करवाने पड़ रही है। जबकि अस्पताल में सोनोग्राफी की जांच सरकार ने निशुल्क कर रखी है। ऐसे में मरीजों को सरकारी योजना का पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। सोनोग्राफी जांच के नाम पर निजी सेंटर मनमाने दाम वसूल रहे हैं। इससे मरीजों का आर्थिक शोषण हो रहा है। लाल बहादुर शास्त्री राजकीय चिकित्सालय आसपास के क्षेत्र का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल होने के कारण यहां पर प्रतिदिन 1000 से 1500 के बीच आउटडोर रहता है। इसमें गायनिक रोग के मरीजों की संख्या 100 से अधिक रहती है। प्रतिदिन 30 प्रसूताओं की सोनोग्राफी जांच लिखी जा रही है। लेकिन चिकित्सक अंदर जांच करवाने के बजाय बाहर से सोनोग्राफी जांच करवाने की सलाह देते हैं। जबकि नियमानुसार चिकित्सक को जांच के लिए सोनोग्राफी रिक्वेस्ट फार्म भरकर प्रसूताओं को देना होता है, लेकिन कमीशन के चलते निशुल्क सोनोग्राफी जांच के लिए कोई फार्म नहीं भरकर दिया जा रहा है। ऐसे में मरीजों को अंदर सोनोग्राफी जांच का लाभ नहीं मिल पा रहा है। मजबूरन मरीजों को महंगे दामों पर बाहर के निजी सेंटरों पर सोनोग्राफी करवानी पड़ रही है। कई प्रसूताओं के परिजनों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि अस्पताल में जहां सोनोग्राफी जांच निशुल्क हो रही है वहीं बाहर के निजी सोनोग्राफी सेंटर पर इसी जांच के 600 से 650 रुपए तक वसूले जा रहे हैं।

पांच साल से नहीं है रेडियोलॉजिस्ट

अस्पताल में सोनोग्राफी मशीन को संचालित करने के लिए पिछले पांच साल से रेडियोलॉजिस्ट का पद रिक्त चल रहा है। अस्पताल में दो स्त्री रोग विशेषज्ञ चिकित्सक भी कार्यरत है। रेडियोलॉजिस्ट का पद रिक्त चल रहा है। इसके कारण स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ.अल्का को ट्रेनिंग दिलाकर सोनोग्राफी करने के लिए नियुक्त कर रखा है। इनमें से करीब 30 मरीजों को सोनोग्राफी जांच तो लिखी जाती है, लेकिन निशुल्क सोनोग्राफी रिक्वेस्ट फार्म भरकर नहीं देने से मरीजों को मजबूरन बाहर से जांच करवानी पड़ रही है। इधर गायनिक चिकित्सक अस्पताल में मौजूद सोनोग्राफी मशीन छोटी मशीन होने से प्रिंट सही नहीं होने की बात कही जा रही है। अगर प्रिंट ही खराब आता है तो शुरूआती दिनों से लेकर लंबे समय तक प्रतिदिन 15 से 20 मरीजों की सोनोग्राफी कैसे साफ हो पाती थी। यह समझ से परे है। वर्तमान में सोनोग्राफी करने वाली चिकित्सक द्वारा छोटी मशीन से प्रिंट साफ नहीं आने से भी सोनोग्राफी जांच कम होने की बात कही जा रही है। जबकि उसकी चिकित्सक द्वारा पूर्व में अस्पताल के अंदर की सोनोग्राफी जांच लिखी जाती थी। यूं तो वर्तमान में कार्यरत दोनों स्त्रीरोग विशेषज्ञों द्वारा अस्पताल के अंदर की ही सोनोग्राफी जांच लिखने की बात कही जा रही है।

जांच रिपोर्ट की क्वालिटी पर शक

जो भी मरीज उनके सोनोग्राफी करवाने के लिए कहता है तो रिक्वेस्ट फार्म भरकर दे दिया जाता है। लेकिन यहां पर रेडियोलॉजिस्ट नहीं होने के कारण तीन माह ट्रेनिंग कर रखे गायनिक चिकित्सक को लगा रखा है। ऐसे में सोनोग्राफी जांच क्वालिटी की आएगी या नहीं इसके बारे में भी मरीजों को भी बता दिया जाता है। डॉ.गिरवर सिंह मीणा, स्त्रीरोग विशेषज्ञ।

बड़ी मशीन की जरूरत

उनके पास तो जो भी सोनोग्राफी जांच के लिए जो फार्म आते है उनकी जांच की जाती है। मशीन के ब्लेक एंड व्हाइट मशीन होने के कारण थोड़ी दिक्कत जरूर है। रेडियोलॉजिस्ट व सोनोलॉजिस्ट नहीं होने से वे भी संपूर्ण सोनोग्राफी जांच नहीं कर पाती है। बड़ी सोनोग्राफी मशीन होना भी बहुत जरूरी है। डॉ.अल्का गुप्ता, स्त्रीरोग विशेषज्ञ।

निशुल्क जांच के बाद स्थिति में गिरावट

सरकार द्वारा मरीजों की सुविधा के लिए वर्ष 2013 में अस्पताल को सोनोग्राफी मशीन उपलब्ध कराई गई थी। उस समय 140 रुपए शुल्क होने लगने के बावजूद प्रतिदिन 15 से 20 सोनोग्राफी होती थी। इसमें 140 में से 100 रुपए एमआरएस में जमा होते थे और 40 रुपए सोनोग्राफी करने वाले चिकित्सक को दिए जाते थे। जबकि अब निशुल्क जांच शुरू होने के बाद से अस्पताल में औसतन एक माह में महज 15 सोनोग्राफी जांच होना बताया है।

जांच विश्वसनीय नहीं

इसके लिए डिप्टी स्पीकर एवं विभाग के उच्चाधिकारियों को अवगत कराया जा चुका है। सरकार गायनिक चिकित्सकों को केवल 3 माह की ट्रेनिंग देकर सोनोग्राफी जांच के लिए लगा रखा है। जिनकी जांच इतनी विश्वसनीय नहीं होती है। डॉ.ए.एल.अग्रवाल, अस्पताल प्रभारी

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