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जैविक पपीतों की चाह में बनवारी के खेत पर ही पहुंच जाते हैं ग्राहक

मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है। पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है इन पंक्तियों...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 19, 2018, 06:15 AM IST

जैविक पपीतों की चाह में बनवारी के खेत पर ही पहुंच जाते हैं ग्राहक
मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है। पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है इन पंक्तियों को चरितार्थ करके दिखाया है पुरुषोत्तमपुरा ग्राम के कोठी की ढाणी निवासी शास्त्री बनवारी लाल ने। वर्तमान में फल व सब्जियों के उत्पादन में हो रहे कीटनाशक दवाओं का भरपूर उपयोग से चिंतित होकर जैविक खेती करने का ख्याल आया। इन्ही प्रयासों के चलते 2 वर्ष पहले 5 हजार की लागत से परंपरागत तरीके से यादव ने पपीता की खेती का काम करना शुरू कर दिया। आज बाजारों में आ रहे फल व सब्जियों में बड़ी मात्रा में कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग किया जा रहा है। जो शरीर में धीमा जहर का काम कर रहा है।

इस प्रकार तैयार करते हैं खाद

50 वर्षीय शास्त्री ने बताया कि जैविक खेती के लिए सबसे पहले बीज से पौध तैयार की जाती हैं। इसके बाद 10 फुट गहरे गड्ढे में नीम, आक, धतूरा को 6-6 इंच की परत के रूप में डाला जाता है। इसके बाद इसमें पानी देकर इसे एक महीने के लिए छोड़ दिया जाता है। जैविक खाद तैयार हो जाने पर ऐसे पौधों की जड़ में डाला जाता है। पौधों की 1 से 2 फुट लंबाई बढ़ने के बाद इस खाद में गोमूत्र मिलाकर पौधों पर इसका छिड़काव किया जाता है। जो कीटनाशक का काम करता है। शास्त्री का कहना हैं कि इन पेडों पर लगने वाले पपीता पूर्णतया कीटनाशक दवाइयां रहित होते है।

पुरुषोत्तमपुरा गांव की कोठी की ढाणी बनी चर्चा का विषय

नारेहड़ा. पपीता के खेत पर अपने परिवार के साथ शास्त्री बनवारीलाल यादव।

मिलता है मन को सुकून : शास्त्री का कहना है की कीटनाशक दवा की जगह जैविक खाद का प्रयोग करने से भले ही फसल तैयार होने में ज्यादा समय व कम उत्पादन होता हो, लेकिन उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता बल्कि लोगों को शुद्ध फल बेचने से मन को सुकून जरूर मिलता है। इनके द्वारा तैयार किए गए पपीता को खरीदने के लिए शाहपुरा, विराटनगर, नीमकाथाना सहित आसपास के ग्राहक इनके खेत पर ही पहुंच जाते हैं। इस कारण इन्हें मंडी की बजाय खेत पर उत्पादन का उचित दाम मिल जाता है। इस काम में प|ी सविता सहित पूरे परिवार के सदस्य जुटे रहते हैं। स्नातक पढ़ाई कर चुके बनवारी लाल बताते हैं कि ये काम कम लागत से शुरू किया जा सकता है। इस फसल में पानी की भी कम जरूरत होती है। पपीता के पेड़ों के बीच स्थित खाली स्थान पर धनिया की बोआई भी हो जाती है। इससे कुछ आमदनी और हो जाती है जिससे परिवार का पालन पोषण ठीक से चल जाता है। इसके अलावा शास्त्री सामाजिक कार्यों में भी बढ़-चढ़कर रुचि लेते हैं।

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