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सिर्फ इलाहाबाद हाई कोर्ट तक सीमित नहीं है साख

न्यायपालिका ने अपनी साख बचाने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति नारायण शुक्ला से कामकाज छीनकर उचित ही...

Dainik Bhaskar

Feb 01, 2018, 01:25 PM IST
सिर्फ इलाहाबाद हाई कोर्ट तक सीमित नहीं है साख
न्यायपालिका ने अपनी साख बचाने के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति नारायण शुक्ला से कामकाज छीनकर उचित ही किया है। इस तरह की सख्त कार्रवाई के बिना लोकतंत्र की इस महत्वपूर्ण संस्था की प्रतिष्ठा को लगा धक्का दूर होने वाला नहीं है लेकिन, अभी न्यायमूर्ति शुक्ला इस्तीफा देने को तैयार नहीं हैं और न ही उन पर महाभियोग की कोई स्पष्ट रूपरेखा बन रही है। मामला सिर्फ न्यायमूर्ति शुक्ला तक सीमित नहीं है। लखनऊ के एक निजी मेडिकल कॉलेज में प्रवेश की अनुमति से संबंधित इस घोटाले में उड़ीसा हाई कोर्ट के एक पूर्व न्यायमूर्ति आईएम कुद्‌दूसी और प्रसाद ट्रस्ट के पदाधिकारी जेल जा चुके हैं। इस विवाद के कारण हाल में सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायमूर्तियों ने मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध बगावत करके प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। उन चारों वरिष्ठ न्यायमूर्तियों ने प्रकट रूप से तो यही कहा था कि रोस्टर के बारे में भारत के मुख्य न्यायाधीश उन्हें महत्वपूर्ण मुकदमों को देखने का मौका नहीं दे रहे हैं पर परोक्ष रूप से उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश पर भी संदेह व्यक्त किया था। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र ने इन तमाम विवादों को हल करने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले न्यायमूर्तियों से कई दौर की बातचीत की है और रोस्टर में पारदर्शिता लाने का वादा किया है। इसी क्रम में मद्रास हाई कोर्ट, सिक्किम हाई कोर्ट और मध्यप्रदेश हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति की तीन सदस्यीय समिति बनाकर न्यायमूर्ति शुक्ला के आचरण की जांच की गई और आरोपों में दम होने के कारण ही उनसे कामकाज छीनकर इस्तीफा देने को कहा गया है। क्या इतने कदम भर से न्यायपालिका की पवित्रता बहाल हो जाएगी या यह मामला कई महाभियोगों तक जाएगा और न्यायपालिका की राजनीतिक छीछालेदर होगी? मौजूदा कार्रवाई के औचित्य से कोई इनकार नहीं कर सकता लेकिन, जिस स्तर की समस्या है उसके लिए पूरे कायाकल्प की जरूरत है और वैसा करने के खतरे भी हैं। इसके बावजूद न्यायपालिका और उसके सगुण रूप कहे जाने वाले न्यायमूर्तियों की साख देश की सभी संस्थाओं के ऊपर होनी चाहिए। उन पर किसी तरह का संदेह होना ही नहीं चाहिए। इस उच्च आदर्श को प्राप्त करने के दृढ़ संकल्प के साथ काम करना होगा और उसमें किसी प्रकार की कोताही भ्रष्टाचार की बीमारी को लोकतांत्रिक देह में और फैला सकती है।

अपनी योग्यता को निष्पक्ष रूप से तोलें

आपके जीवन में जो संपत्ति आई, जो वैभव उतरा, जितनी और जैसी भी समृद्धि आपने प्राप्त की है, कभी विचार करिएगा कि उसमें आप अकेले का योगदान कितना है? सबसे पहले यह देखें कि आज मेेेरे पास भौतिक रूप से जो कुछ भी है उसमें मेरा सेल्फ कॉन्ट्रिब्यूशन क्या है? उसके बाद फिर सबसे निकट के माता-पिता, जीवनसाथी, बच्चे, रिश्तेदार, मित्र ये सब आएंगे। आप कोई भी काम करेंगे, उसमें अधिकारी-कर्मचारी भी सहयोगी होंगे ही। इन सबको खानों में बांटकर ईमानदारी से विश्लेषण करें कि स्वयं ने क्या किया। आपने पहला काम यह किया होगा कि संबंध निभाए होंगे। जो लोग संबंध अच्छे से निभाते हैं वो कमजोर होने के बाद भी उन संबंधों के कारण लाभ उठा लेते हैं। यह भी एक काम है, लेकिन फिर भी गहराई में जाकर देखें कि आपने क्या किया? केवल संबंध निभाने से धीरे-धीरे आप उनका उपयोग करने लगते हैं। फिर एक दिन आपके लिए संबंध भी सौदा हो जाते हैं। इसलिए कोशिश यह भी की जाए कि इसमें सर्वाधिक योगदान आपका ही हो और उस योगदान को अहंकार से बचाकर चलें। यदि आपने पाया कि स्वयं का योगदान अधिक है तो तुरंत अहंकार दस्तक देगा और सारे किए-धरे पर पानी फिर जाएगा। इसलिए कम-से-कम इस पर जरूर विचार करें कि मैं क्या था और मैंने कैसे इसको प्राप्त किया? आप स्त्री हो या पुरुष, अपनी योग्यता को निष्पक्ष रूप से खुद ही तोलें और उस योग्यता से जो प्राप्त किया है, उन दोनों का तालमेल बैठाएं। तब सबकुछ होने के साथ-साथ आप शांत भी रह सकेंगे।



पं. िवजयशंकर मेहता

humarehanuman@gmail.com

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