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पंजाबी बाहुल्य में 70 साल से राजस्थानी संस्कृति को कायम रखने की मुहिम, होली आते ही गूंजता है...फागण आयो रे

भास्कर संवाददाता|श्रीगंगानगर यूं तो श्रीगंगानगर राजस्थान में है, लेकिन रहन-सहन पंजाबी है। पंजाब बॉर्डर से सटे...

Danik Bhaskar | Mar 01, 2018, 06:50 AM IST
भास्कर संवाददाता|श्रीगंगानगर

यूं तो श्रीगंगानगर राजस्थान में है, लेकिन रहन-सहन पंजाबी है। पंजाब बॉर्डर से सटे होने के कारण श्रीगंगानगर क्षेत्र में पंजाबी संस्कृति का प्रभाव ज्यादा है। बावजूद इसके मरूधर कला मंच यहां राजस्थानी संस्कृति को कायम रखे हुए है। करीब 70 साल से इलाके में भी होली से जुड़े फाल्गुन के गीत गूंजते हैं। जैसे ही होली नजदीक आती है तो मंच गली-मोहल्लों में फागण आयो रे... जैसे गीतों के जरिए राजस्थानी संस्कृति की छटा बिखरने लगती है। मंच के सदस्य राकेश गुरावा और भगवती प्रसाद बिस्सा बताते हैं कि मंच की ओर से सालभर राजस्थानी संस्कृति के कार्यक्रम निशुल्क आयोजित किए जाते हैं। मकसद एक ही है कि लोग राजस्थानी संस्कृति, रीति रिवाजों, मायड़ भाषा और परंपराओं से परिचित हो सकें तथा उनको आत्मसात कर सकें। मंच की ओर से हर साल करीब डेढ़ लाख रुपए खर्च कर राजस्थानी वेशभूषा, कमर फेंटा, घुंघरू, डफ, मोतियों की माला, बैनर और मेकअप का सामान, बांसुरी, मंजीरे, ढोलक सहित 40 सदस्यों की वेशभूषा को खरीदते हैं। होली पर तो इस मंच का रंग देखते ही बनता है। पूरे 40 दिन शहर और जिले में मंच की मंडली रोजाना चंग की धमाल मचाती है। भारी भीड़ रोजाना फागोत्सव देखने उमड़ती है। मंच को अब अमरचंद बोरड़, मोहनलाल गुरावा, घनश्याम बिनानी, किशनलाल उपाध्याय, लखपत सिंह राठौड़, दुर्गाप्रसाद तांवणियां, मांगीलाल,विष्णु बिस्सा व सतपाल सुथार आगे बढ़ा रहे हैं।

चंग-धमाल के साथ दे रहे नशा मिटाने का संदेश

मंच चंग धमाल के कार्यक्रमों में नशा विरोधी अभियान भी चला रहा है। मंच के 100 से अधिक सदस्यों की मंडली है। खास बात ये भी है कि मंडली सदस्य किसी भी तरह के नशे से दूर रहते हैं। छोटूलाल बिस्सा, भगवती प्रसाद, पूनमचंद बिस्सा व नीतेश भी मंच से जुड़कर राजस्थानी संस्कृति का प्रचार प्रसार कर रहे हैं। इन पूरा परिवार इसमें भागीदारी निभाता है।

भास्कर संवाददाता|श्रीगंगानगर

यूं तो श्रीगंगानगर राजस्थान में है, लेकिन रहन-सहन पंजाबी है। पंजाब बॉर्डर से सटे होने के कारण श्रीगंगानगर क्षेत्र में पंजाबी संस्कृति का प्रभाव ज्यादा है। बावजूद इसके मरूधर कला मंच यहां राजस्थानी संस्कृति को कायम रखे हुए है। करीब 70 साल से इलाके में भी होली से जुड़े फाल्गुन के गीत गूंजते हैं। जैसे ही होली नजदीक आती है तो मंच गली-मोहल्लों में फागण आयो रे... जैसे गीतों के जरिए राजस्थानी संस्कृति की छटा बिखरने लगती है। मंच के सदस्य राकेश गुरावा और भगवती प्रसाद बिस्सा बताते हैं कि मंच की ओर से सालभर राजस्थानी संस्कृति के कार्यक्रम निशुल्क आयोजित किए जाते हैं। मकसद एक ही है कि लोग राजस्थानी संस्कृति, रीति रिवाजों, मायड़ भाषा और परंपराओं से परिचित हो सकें तथा उनको आत्मसात कर सकें। मंच की ओर से हर साल करीब डेढ़ लाख रुपए खर्च कर राजस्थानी वेशभूषा, कमर फेंटा, घुंघरू, डफ, मोतियों की माला, बैनर और मेकअप का सामान, बांसुरी, मंजीरे, ढोलक सहित 40 सदस्यों की वेशभूषा को खरीदते हैं। होली पर तो इस मंच का रंग देखते ही बनता है। पूरे 40 दिन शहर और जिले में मंच की मंडली रोजाना चंग की धमाल मचाती है। भारी भीड़ रोजाना फागोत्सव देखने उमड़ती है। मंच को अब अमरचंद बोरड़, मोहनलाल गुरावा, घनश्याम बिनानी, किशनलाल उपाध्याय, लखपत सिंह राठौड़, दुर्गाप्रसाद तांवणियां, मांगीलाल,विष्णु बिस्सा व सतपाल सुथार आगे बढ़ा रहे हैं।