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किसान खेती में नई तकनीक के इस्तेमाल व वैज्ञानिकों की सलाह से बढ़ा सकते हैं उत्पादन

किसान खेती की परंपरागत विधियों में नई तकनीक का इस्तेमाल कर उत्पादन बढ़ा सकते हैं। इससे उत्पादकता भी ज्यादा हो सकती...

Danik Bhaskar | Apr 17, 2018, 04:00 AM IST
किसान खेती की परंपरागत विधियों में नई तकनीक का इस्तेमाल कर उत्पादन बढ़ा सकते हैं। इससे उत्पादकता भी ज्यादा हो सकती है। इसके लिए किसानों को कृषि वैज्ञानिकों या कृषि अधिकारियों की सलाह पर अमल करना चाहिए। कंप्यूटर और मोबाइल के जरिए खेती के नए तरीके जानने के इच्छुक किसानों को भी लगातार इनसे संपर्क में रहना चाहिए। इससे काम करने के तरीकों में गुणात्मक सुधार आने के साथ अच्छी और ज्यादा फसल ले सकते हैं। हालांकि जैविक खेती से फसल की गुणवत्ता में अत्यधिक सुधार होता है, लेकिन उत्पादकता पर असर आता है, क्योंकि मृदा में कई पोषक तत्व कम होते हैं, जिनका असर उत्पादकता पर पड़ता है।

हार्वेस्टिंग : फसल कटाई में नई तकनीक से युक्त हार्वेस्टर्स का इस्तेमाल करना चाहिए। इसके बाद थ्रेसर का इस्तेमाल करना चाहिए। इससे समय और श्रम की बचत होगी। वैसे बाजरे की हार्वेस्टिंग हाथों से करना अच्छा माना जाता है।

मृदा जांच : यहां दुर्गापुरा स्थित राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान (रारी) में सहायक प्रोफेसर डॉ. श्वेता गुप्ता का कहना है कि खेती में नई तकनीक की इस्तेमाल करना है तो सबसे पहले मिट्‌टी की जांच करवानी चाहिए। सरकार की ओर से इसकी व्यवस्था है। मृदा का हर 3 साल में परीक्षण करवाना लाभदायक होता है। जांच कराने से मृदा में पोषक तत्वों की अनुलब्धता या कमी का पता चल जाता है। मृदा में पोषक तत्वों की कमी की पूर्ति हर फसल के लिए अलग-अलग होती है। मृदा जांच के बाद कृषि वैज्ञानिक कमी के अनुसार खेत में खाद या फर्टिलाइजर डालने की सलाह देते हैं।

फसल के ज्यादा उत्पादन के लिए खरपतवार पर नियंत्रण करना जरूरी

खेती में फसल को अधिक उपजाऊ बनाने के लिए जरूरी है कि खरपतवार को नियंत्रित किया जाए। इसमें नई तकनीक और वैज्ञानिक तरीके अपनाए जाएं तो फसल की मात्रा बढ़ सकती है। इसके लिए ये तरीके अपनाए जा सकते हैं।

(अ) गहरी जुताई : खरपतवार नहीं पनपे, इसके लिए सबसे पहले खेत को गर्मी के दौरान गहरी जुताई कर छोड़ दें। इससे कीड़े और सूक्षकृमियों के मरने के साथ ही वनस्पति के कई बीज स्वत: ही खत्म हो जाते हैं।

(ब) खुरपी से : खुरपी से खरपतवार हटाना परंपरागत तरीका है। बुआई के 20 से 30 दिन बाद खुरपी से खुदाई कर या खुरचकर खरपतवार हटाई जाती है। किसान स्वयं या श्रमिकों की मदद से इसे हटा सकते हैं।

(स) हर्बीसाइड का इस्तेमाल : खरपतवार हटाने के लिए श्रमिकों की कमी होने पर किसान हर्बीसाइड का इस्तेमाल कर सकते हैं। डॉ. श्वेता गुप्ता का कहना है कि हर खरपतवार के लिए अलग-अलग नाशक होता है। कुछ के लिए बुआई के दो दिन बाद नाशक मिट्‌टी के नमी रहते डालें। कुछ के लिए 20-25 दिन बाद खड़ी फसल में डालना चाहिए।

पौध सरंक्षण : कीट या रोग होने की स्थिति में हर 15 दिन के अंतराल से मेंकोजेब या कारबेंडाजेम से स्प्रे कर सकते हैं। चूसक कीड़े लगने पर एमिडा क्लोरपिड का छिड़काव करना चाहिए। स्प्रे कटाई से एक से डेढ़ माह पहले ही करना चाहिए।

बाॅयो फर्टिलाइजर्स : डॉ. गुप्ता का मानना है कि कृषि वैज्ञानिक एन पी के के सूत्र के अनुसार सलाह देते हैं। एन अर्थात नाइट्रोजन की कमी को यूरिया डालकर पूरा किया जा सकता है। पी यानी फास्फोरस की कमी पर डीएपी और के मतलब पोटेशियम की कमी पर न्यूरोटा ए पोटेश खेत में डालने की सलाह दी जाती है। वैसे न्यूरोटा के पोटेश को पोटशियम की कमी होने पर ही डालना चाहिए अन्यथा नहीं। इसके साथ ही माइक्रो न्यूट्रेंट (सूक्ष्म पोषक तत्व) जिंक, सल्फर और आयरन की कमी के अनुसार सूक्ष्म पोषक तत्व डाले जा सकते हैं। इन सूक्ष्म पोषक तत्वों को फर्टिलाइजर्स के साथ डालने से फायदा होता है। इससे बुआई से पहले से पोषक तत्वों के मौजूद रहने से फसल की पौध तक जल्द पहुंच सकते हैं। सूक्ष्म पोषक तत्व सॉलिड और लिक्विड दोनों रूप में उपलब्ध हैं। कई किसान लिक्विड पोषक तत्वों का इस्तेमाल करते हैं, हालाकि अभी तक सरकार की ओर से इस तरह की कोई सलाह जारी नहीं की गई है। इस पर शोध चल रहा है, अब तक के परिणाम सकारात्मक रहे हैं।