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आयोजनों में प्रदर्शन से समाज को नहीं बांटना चाहिए

इन दिनों चाहे छोटा-सा गांव हो या बहुत बड़ा शहर, आयोजनों की बाढ़ आ गई है। धार्मिक आयोजन तो धीरे-धीरे बढ़ ही रहे हैं,...

Danik Bhaskar | May 18, 2018, 05:05 AM IST
इन दिनों चाहे छोटा-सा गांव हो या बहुत बड़ा शहर, आयोजनों की बाढ़ आ गई है। धार्मिक आयोजन तो धीरे-धीरे बढ़ ही रहे हैं, उनमें भरपूर प्रदर्शन उतर रहा है, लेकिन सामाजिक आयोजनों का भी सैलाब-सा आ गया है। हर समाज बड़े पैमाने पर कुछ न कुछ कार्यक्रम करता है। थाली में एक ही तरह की खिचड़ी हो तो समझ में भी आता है कि खिचड़ी जरूर है पर एक ही है। लेकिन अब तो एक ही थाली में खिचड़ी भी अलग-अलग ढंग की परोसी जा रही है। खिचड़ी का मतलब होता है अलग-अलग अन्न को मिलाकर इतना उबाल दिया जाए कि उनका भेद ही खत्म हो जाए। भारत में हर समाज अपने आपमेें खिचड़ी का प्रतीक है पर खिचड़ी से खिचड़ी का मुकाबला होने लगे तो खाने वाले के लिए परेशानी खड़ी हो जाती है। जब से समाजों में सामूहिक विवाह का दौर आया, धीरे-धीरे सरकारों ने प्रवेश कर लिया। सामूहिक विवाह का उद्‌देश्य यह था कि आर्थिक रूप से असमर्थ लोग भी अपना मंगल परिणय गरिमापूर्ण ढंग से कर सकें। लेकिन समाजों ने इतना प्रदर्शन किया कि लगता है दुनिया एक बार फिर चार वर्णों में बंट गई- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। हर युग में समझदार लोगों ने कहा है कि यह बंटवारा किया जरूर गया था लेकिन, इसके पीछे दायित्व और स्वभाव था। लेकिन आज हमें इस खतरे से बचना होगा कि कहीं समाज प्रदर्शन, आयोजनों की प्रतिस्पर्धा करके कहीं फिर से लोगों को ऐसे वर्ण में तो नहीं बांट रहा है? क्योंकि हर धर्म के ईश्वर ने पहली प्राथमिकता भक्त को दी है, न कि भेद को।



पं. िवजयशंकर मेहता

humarehanuman@gmail.com

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