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वैलेंटाइन-डे की बजाय छात्राअाें ने मातृ-पितृ व गुरु पूजन दिवस मनाकर कहा- इसी पर टिकी है हमारी संस्कृति

Shriganganagar News - एक तरफ शुक्रवार को वैलेंटाइन-डे पर प्रेमी प्रेमिका अपने प्रेम का इजहार करते हैं तो दूसरी तरफ कुछ लोग इसे भारतीय...

Feb 15, 2020, 11:36 AM IST
Sriganganagar News - rajasthan news instead of valentine39s day the students celebrated mother and father and guru puja day by saying our culture is based on this

एक तरफ शुक्रवार को वैलेंटाइन-डे पर प्रेमी प्रेमिका अपने प्रेम का इजहार करते हैं तो दूसरी तरफ कुछ लोग इसे भारतीय संस्कृति के विरुद्ध मानते हुए नई पीढ़ी में इस दिन को मातृ-पितृ एवं गुरु पूजन दिवस के तौर पर मनाते दिखे। इसी कड़ी में श्री याेग वेदंात सेवा समिति की अाेर से शुक्रवार सुबह हनुमानगढ़ राेड स्थित श्री आत्मवल्लभ जैन कन्या महाविद्यालय में मातृ-पितृ पूजन कार्यक्रम हुअा। इसमें छात्राओं ने अपने गुरुजनाें की पूरे विधि विधान के साथ पूजा अर्चना की। सबसे पहले छात्राअाें ने अपने गुरुजनाें को किसी ऊंचे आसन पर बिठाया। इसके बाद गुरुजनाें के माथे पर कुमकुम का तिलक किया। फिर गुरुजनाें के सिर पर पुष्प और अक्षत रखे, फूलमाला पहनाई और आरती कर सात परिक्रमा की। आखिर में माता-पिता व गुरुजनाें की सेवा करने का दृढ़ संकल्प लिया। इस दाैरान छात्राअाें ने कहा कि हमारी संस्कृति इसी पर टिकी हुई है। अाप भी इन तीन तस्वीराें के माध्यम से जानें कि छात्राअाें ने किस तरह से तिलक कर गुरुजनाें की पूजा-अर्चना की...

माता-पिता भी भगवान का साक्षात रूप हैं उनकी सात परिक्रमा करें : समिति के सेवादार संजय पेड़ीवाल ने कहा कि इस दिवस को मनाने के लिए सोशल मीडिया का प्रयोग कर सभी को प्रेरित करें ताकि हमारे नई युवा पीढ़ी जो भटक रही है उनको सही दिशा मिल सके क्योंकि जीवन में शिक्षा के साथ संस्कार का होना भी बहुत जरूरी है। उन्हाेंने कहा कि हम सब मंदिर में जाकर भगवान के आगे नतमस्तक होते हैं उसी प्रकार माता-पिता भी भगवान का साक्षात रूप है उनकी सात परिक्रमा करें।


सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमय: पिता।
मातरं पितरं तस्मात् सर्वय|ेन पूजयेत्।।


अर्थात: माता सर्वतीर्थ मयी और पिता सम्पूर्ण देवताओं का स्वरूप हैं इसलिए सभी प्रकार से य|पूर्वक माता-पिता का पूजन करना चाहिए। जो माता-पिता की प्रदक्षिणा करता है, उसके द्वारा सातों द्वीपों से युक्त पृथ्वी की परिक्रमा हो जाती है। माता-पिता अपनी संतान के लिए जो क्लेश सहन करते हैं, उसके बदले पुत्र यदि सौ वर्ष माता-पिता की सेवा करे, तब भी वह इनसे उऋण नहीं हो सकता।

पित्राेश्च पूजनं कृत्वा प्रकान्तिं च कराेति य:।

तस्य वै पृथिवीजन्यफलं भवति निश्चितम्।।

अर्थात: जाे पुत्र माता-पिता की पूजा करके उनकी पदक्षिणा करता है, उसे पृथ्वी परिक्रमाजनित फल अवश्य सुलभ हाे जाता है।

त्सर्वश्रुतिशिरोर|विराजित पदाम्बुजः।
पुण्य यशस्यमायुष्यं तिलकं मे प्रसीदतु।।


अर्थात: उस महान गुरु के लिए अभिवादन, जिसके कमल रूपी चरण सभी श्रुतियों के शीर्ष गहने से प्रकाशित है। एेसे गुरु को पुण्य यश और आयुष्य के लिए तिलक प्रदान करता हूं।

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