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समाज में पढ़ना मना था, जिद करके पढ़ाई शुरू की तो इंजीनियर बन गई शबनम
स्कूल की दीवार के पास छिपकर मैं कहानी को सुन रही थी कि मैडम की नजर मुझ पर पड़ी और मुझे कमरे में बुलाया। मैं कहानी सुनती रही। घर आई तो किसी ने मम्मी को बताया कि शबनम स्कूल गई। मम्मी ने मुझे खूब डांटा और कहा कि स्कूल में लड़की का जाना हमारे दीन के खिलाफ है।
मेवात में जहां मेव समाज में लड़कियों को स्कूल भेजना बहुत से लोग मजहब के खिलाफ मानते थे। बेटी का स्कूल जाना अपराध से कम नहीं समझते थे। मेवात के करीब 25 गांवों में लड़कियां स्कूल नहीं जाती थी। इस मिथक को तोड़ा मिर्जापुर की 13 साल की बेटी ने। जंगल से लकडिय़ां लाने के बाद पहली बार स्कूल में कदम रखा, पढ़ी और इंजीनियर बनी। पढ़ाई के दौरान घर में कमाने वाले बड़े भाई मुश्ताक की दुर्घटना में मौत हो गई। इंजीनियरिंग करते समय पिता फैजू का सिर से साया उठ गया। हार नहीं मानी। शिक्षा के लिए संघर्ष की कहानी है गांव मिर्जापुर की बेटी शबनम की।
शबनम बताती है कि 2005 तक मिर्जापुर गांव में 5 वीं तक का स्कूल था। एक अध्यापक थे और स्कूल में 7-8 लड़के पढ़ते। उस समय लड़की को स्कूल भेजना बुरा माना जाता था। मेरी उम्र 13 साल की थी। मैं मम्मी जुम्मी के साथ पशु्ओं का काम करती और बडी बहन के साथ जंगल से लकडियां लेकर आती थी। एमिड संस्था ने सामुदायिक भवन में छह महीने के लिए रेजीडेंशियल कैंप लगाया। मैं एक दिन उसे देखने चली गई। वहां मैडम बच्चों को कहानी सुना रही थी। दीवार के पास छिपकर कहानी को सुन रही थी कि मैडम की नजर मुझ पर पड़ी और मुझे कमरे में बुलाया। मैं कहानी सुनती रही। घर आई तो किसी ने मम्मी को बताया कि शबनम स्कूल गई। मम्मी ने मुझे खूब डांटा और कहा कि स्कूल में लड़की का जाना हमारे दीन के खिलाफ है।
अगले दिन मैं छुपकर फिर क्लास में पहुंच गई। मुझे चौथी क्लास के बच्चों के साथ बैठा दिया। घर लौटने पर मां और बडी बहन का डर लग रहा था कि आज पिटाई होगी। पापा फैजू को कहा कि मैं पढना चाहती हूं। संस्था वालों ने मम्मी और पापा को समझाया तो मान गए। मैं जंगल से लकडियां लेकर 11 बजे लौटती और स्कूल जाती। मै देर से स्कूल जाती तब भी मैडम मुझे कुछ नहीं कहती। छह महीने के रेजिडेंशियल कैंप में चौथी क्लास के बच्चो के साथ पढी। इस दौरान गांव का स्कूल क्रमोन्नत होकर आठवीं तक हो गया। मेरा 2006 में छठी क्लास में दाखिला करा दिया। 2012 में मैने 10 वीं कर ली। अब आगे की पढाई के लिए गांव में स्कूल नहीं था। बाहर भेजने के लिए घर वालों ने मना कर दिया। मैं पापा से कहती रहती कि मुझे आगे पढना है। मुझे कुछ बनना है। कई बार मम्मी कहती है कि बदनामी नहीं करानी। हमें जी लेने दे। बडा भाई भी पढ़ाने के लिए राजी नहीं था। तब संगीता और पूजा मैडम ने मम्मी और पापा को समझाया। मैं भी जिद पर अड़ी थी।
भाई की मौत के कारण पेपर नहीं दे पाने के कारण बैक लगा, इंजीनियरिंग के दौरान पिता की हुई मौत: 2014 में सेकंड ईयर में दो पेपर हो गए थे, इसी दौरान भाई मुश्ताक की मथुरा में सडक दुर्घटना में मौत हो गई। भाई ऑटो चलाता था। घर में वहीं कमाने वाला था। घर में हम तीन भाई और तीन बहने थे। मुश्ताक बडा भाई था। पेपर नहीं देने के कारण मेरी बैक लग गई। घर वाले भी कहने लगे कि अब पढ़ा नहीं सकते। तू फेल भी हो गई लेकिन मैने कहा कि मैं अगले वर्ष में बैक पेपर निकाल लूंगी। बाद में पापा मुझे अलवर छोड़ गए। 2015 में थर्ड ईयर में थी तो रूम टूरिड संस्था मुझे सिंगापुर ले गई। जब मैं विदेश जा रही थी तो गांव वाले तरह तरह की बातें कर रहे थे। मैं कभी अलवर से बाहर नहीं गई थी। 2016 में पालिटेक्निक पूरा हा़े गया। इसके बाद पापा बोले कि तेरा विवाह कर देते हैं लेकिन मैने कहा कि अभी मुझे बीटेक करना है। मैने एलआईईटी में बीटेक में प्रवेश लिया। इसके लिए मैने एज्युकेशन लोन लिया और पढाई शुरू कर की। डिप्लोमा के बाद सेकंड ईयर में एडमिशन हो गया। 11 मई 2017 को पापा की ब्लड कैंसर से मौत हो गई। 2019 में मेरी बीटेक पूरी हो गई। अब प्रतियोगी परीक्षा की तैयार कर रही हूं।