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बड़े करीब से उठकर चला गया कोई...

2 वर्ष पहले
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सुषमाजी हमारे बीच नहीं रहीं। अपने इंतकाल के चंद माह पहले मीना कुमारी ने एक शेर पढ़ा था, ‘न हाथ थाम सके न पकड़ सके दामन, बड़े करीब से उठकर चला गया कोई।’ सुषमा जी के निधन के बाद मुझे लगता है कि हर उस व्यक्ति को जो कभी ज़िंदगी में एक बार भी उनसे मिला हो, यही भाव उसके मन में उपज रहे होंगे। राजनीतिक से ज्यादा उनका सामाजिक व्यक्तित्व प्रभावित करता था। जिस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विदेश मंत्रालय का कार्यभार अपने ऊपर ले रखा था कोई सामान्य मंत्री कार्य के प्रति उदासीन हो जाता लेकिन उनके सुषमा जी ने ‘गवर्नेन्स का मानवीय चरित्र’ के रूप में एक नया सिद्धांत दिया। विदेश में फंसा एक भारतीय मात्र एक ट्वीट करके पूरे विदेश मंत्रालय को आधी रात को हरकत में ला सकता था। बाद के दिनों में अन्य विभागों न इस मॉडल को अंगीकार किया। रेल मंत्रालय ने भी इसी भाव को अंगीकार किया। कई बार हम लोग यह भी कहते थे भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी बहुत ज्यादा अंग्रेजीदां होते हैं और वे ही नहीं, उनकी प|ियों ने हिंदी सीखने और पार्टियों में बोलना शुरू कर दिया। जनता का विश्वास सुषमाजी में इतना ज्यादा था कि जब वे विदेश मंत्री थीं तो एक व्यक्ति ने ट्वीट किया ‘सुषमाजी हमने एक रेफ्रिजरेटर खरीदा था दो दिन से वह चल नहीं रहा है, गाढ़ी कमाई से खरीदा था’। सुषमा जी ने उसे जवाब दिया कि मानव संकट में तो कुछ प्रयास किया जा सकता है, मशीन के संकट का समाधान मेरे बस में नहीं है फिर भी मैं देखती हूं।’ संसद में अगर सवाल अंग्रेजी में है तो वे शुद्ध अंग्रेजी में जवाब देतीं थीं और अगले क्षण अगर सवाल हिन्दी में तो उनका जवाब भी उतनी हीं शुद्ध हिन्दी में। मानो किसी कम्प्यूटर का बटन दबा दिया गया है। याद आता है कि 1996 में अविश्वास प्रस्ताव पर बहस चल रही थी। अटलजी की 13 दिन की सरकार थी और जितने भावातिरेक से सुषमाजी भारतीय पौराणिक कथाओं के जरिए अपनी बात कह रहीं थीं। 5 मिनट के बाद सारे रिपोर्टर्स ने लिखना बंद कर दिया और उस भाषण को मंत्रमुग्ध हो सुनने लगे। सुषमाजी का दिवंगत होना न केवल भारतीय जनता पार्टी या राजनीति या भारत के लिए बल्कि पूरी मानवता के लिए अपूर्णीय क्षति है।

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