ये है लो टनल; एक हेक्टेयर में बैगन 800 व टमाटर 600 क्विंटल उत्पादन, पानी और खाद की भी बचत

Shriganganagar News - लो टनल विधि से सब्जियों का उत्पादन किसानों को मालामाल करेगा। राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय बीकानेर के स्थानीय...

Bhaskar News Network

Jan 14, 2019, 06:57 AM IST
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लो टनल विधि से सब्जियों का उत्पादन किसानों को मालामाल करेगा। राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय बीकानेर के स्थानीय कृषि अनुसंधान केंद्र का किफायती विधि लो टनल से सब्जियों का पानी और खादों की बचत के साथ दोगुना उत्पादन करने का ट्रायल सफल हुआ है। इससे पानी की 70 प्रतिशत और खादों की 25 प्रतिशत तक बचत कर बैंगन का 800 और टमाटर का 600 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उत्पादन लिया जा चुका है। लो टनल की फसल खुले आसमान की खेती अपेक्षा एक महीना पहले आती है। इससे सब्जियों का बाजार में दाम भी ज्यादा मिलता है। यानि हर तरह से फायदा है।

जल प्रबंधन परियोजना के लो टनल विधि से पहले टमाटर की फसल का उत्पादन लिया गया। इसके बाद बैंगन, लोकी, तोरी और करेला पर भी ट्रायल किया जा रहा है। इसमें भी परिणाम अच्छे मिले हैं। इस पर अनुसंधान कर रहे विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. आरपीएस चौहान के अनुसार यहां पानी का संकट और मौसम की मार पड़ती है, वहां लो टनल कारगर है। खासकर सर्दी के मौसम में इसमें समय से पहले सब्जियों को उगाया जा सकता है। इसमें करेला का 250 एवं तोरी 300 क्विंटल प्रति हैक्टेयर उत्पादन लिया जा चुका है।

डॉ. चौहान ने बताया कि अनुसंधान केंद्र में लो टनल पद्धति से सब्जी उत्पादन देखकर श्रीबिजयनगर सहित कई क्षेत्रों में प्रगतिशील किसानों ने इसे अपनाया है और बेहतर सब्जी उत्पादन ले रहे हैं।

लो टनल विधि... पौधों को पॉलीथिन से ढककर नियंत्रित किया जाता है तापमान

लो टनल में दो से अढ़ाई फुट ऊंची अर्द्ध चंद्राकार आकार में मुड़े लोहे के सरियों या फिर बांस की छड़ियों काे कतार में जमीन में गाड़ दिया जाता है। इसमें दो सरियों के बीच की दूरी करीब 20 फुट तक रखी जाती है। इस कतार में सब्जी के पौधे लगाकर उसे प्लास्टिक की शीट से कवर कर दिया जाता है। पौधों को पानी व खाद देने के लिए इसके अंदर ड्रिप सिस्टम लगाया जाता है। इसकी प्रति हैक्टेयर लागत डेढ़ से दो लाख रुपए आती है। सब्जी की बढ़ी उपज, खाद और पानी की घटी मांग से यह खर्च किसान एक साल में पूर कर सकता है। इसमें सरिया 15 साल तक चलता है। प्लास्टिक शीट भी तीन से चार साल तक खराब नहीं होती है।

ये तीन फैक्टर बढ़ाते हैं उत्पादन; कॉर्बन डाइऑक्साइड , घुलनशील उर्वरक और बढ़ा तापमान

कृषि वैज्ञानिक डॉ. चौहान के अनुसार लो टनल में फसल प्लास्टिक की शीट से ढ़की होने की वजह से रात को छोड़ी कॉर्बन डाइऑक्साइड का अावरण दिन में भी बना रहता है। इससे धूप में पौधे की भोजन बनाने की क्षमता बढ़ने से बढ़वार ज्यादा होती है। दूसरा ड्रिप से दिया धुलनशील उर्वरक सीधे पौधे की जड़ में असर करते हैं। तीसरा दिसंबर व जनवरी में तापमान में गिरावट होने से बढ़वार नहीं होती। लो टनल में पौधा कवर से अंदर का न्यूनतम तापमान 5.0 डिग्री सेल्सियस और अधिकतम 10.0 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा रहता है। वातावरण अनुकूल मिलने से पौधा एक महीना पहले ही तैयार हो जाता है। फल व फूल पहले आते हैं। इन तीनों वजहें ही उत्पादन बढ़ाने में मददगार बनती हैं। सीजन के प्रारंभ में इन सब्जियों का भाव भी ज्यादा मिलता है। चारों तरफ से प्लास्टिक शीट का कवर होने से कीट प्रकोप भी कम रहता है।

श्रीगंगानगर। कृषि अनुसंधान केंद्र में जलप्रबंधन योजना के तहत लो टनल पद्धति से लोकी और तोरी के अपने ट्रायल देखते कृषि वैज्ञानिक डॉ.आरपीएस चौहान।

सर्दियों में मिल जाती हैं गर्मियों में आने वाली सब्जियां: इस लो टनल के जरिए गर्मियों में आने वाली सब्जियां सर्दियों के अंत तक प्राप्त हो जाती है। कृषि अनुसंधान केंद्र में जल प्रबंधन परियाेजना पर सब्जियों का ट्रायल ले रहे डॉ. आरपीएस चौहान कहते हैं कि इस लो टनल में तापमान आकस्मिक रूप से नियंत्रित रहता है। लो टनल केवल सर्दियों में सब्जियां तैयार करने के लिए इस्तेमाल की जाती है। डॉ. चौहान इससे पूर्व करेला, बैंगन, टमाटर और तोरी की फसल ले चुके हैं। लो टनल में सब्जियों की पौध नवंबर के अंतिम अथवा दिसंबर के प्रथम सप्ताह में ट्रांसप्लांट की जाती है। सब्जियों के बीज उपचारित कर सीधे मेड़ पर रोपकर पॉलीथिन की सीट से ढक देते हैं।

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