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श्रीगंगानगर| पत्रकारिता, अखबार, न्यूज चैनल और सोशल साइट्स ट्रैक...ये मीडिया

श्रीगंगानगर| पत्रकारिता, अखबार, न्यूज चैनल और सोशल साइट्स ट्रैक...ये मीडिया के अलग-अलग रूप हैं। इनकी विश्वसनीयता और...

Danik Bhaskar | Sep 12, 2018, 06:36 AM IST
श्रीगंगानगर| पत्रकारिता, अखबार, न्यूज चैनल और सोशल साइट्स ट्रैक...ये मीडिया के अलग-अलग रूप हैं। इनकी विश्वसनीयता और प्रस्तुतिकरण को लेकर मंगलवार को व्याख्यान में खुलकर विचार रखे गए। मौका था साहित्यकार राकेश शरमा की स्मृति में आयोजित ‘मीडिया का बदलता स्वरूप’ विषय पर व्याख्यान का। यह आयोजन सृजन सेवा संस्थान व अरोड़वंश गर्ल्स कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत में अतिथियों व राकेश शरमा के बेटे नलिन और बेटी अनिता ने दिवंगत साहित्यकार के चित्र पर पुष्प अर्पित किए। मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार रेवतीरमण शर्मा ने सोशल मीडिया से समाज पर पड़ रहे दुष्प्रभाव को बयां किया। उनका लहजा जरूर शांत दिखा...पर शब्द सख्त रहे। उन्होंने कहा कि अखबारों में जो छप रहा है या टीवी चैनलों में जो दिखाया जा रहा है, वह सब स्वतंत्र सोच का प्रतीक ही हो, यह जरूरी नहीं है। आज केवल मीडिया ही नहीं बदल रहा है, सम्पूर्ण समाज बदल रहा है। कार्यक्रम अध्यक्ष वरिष्ठ रंगकर्मी राकेश मोंगा ने राकेश शरमा के साथ बिताए दिनों को याद किया। जाने-माने साहित्यकार डॉ. संदेश त्यागी ने सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच इसके खतरों की ओर संकेत किया। सृजन के उपाध्यक्ष व जिला आबकारी अधिकारी भूपेंद्रसिंह भी मीडिया में थोपे जा रहे मनगढंत समाचारों पर गंभीर नजर आए। सृजन के सचिव साहित्यकार डॉ. कृष्णकुमार आशु ने राकेश शरमा के साहित्य पर चर्चा की। कॉलेज प्राचार्य डॉ. विशाल छाबड़ा ने भी मीडिया विषय की गंभीरता पर बात की। मंच संचालन व्याख्याता संदीप कुमार ने किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्यकार, कॉलेज स्टाफ और छात्राएं मौजूद थीं।

बदलते जमाने... पहनावे और सच की तलाश में लिखे व्यंग्य बेहद चर्चित रहे : राकेश शरमा ने लिखा बदलते जमाने पर लिखा- जमाना वास्तव में बदल रहा है। बहुत बार तो यह भी पता नहीं चलता कि जो आदमी इतनी मीठी-मीठी समाज हित की बात कर रहा है, वह किसी तरह की ठगी मारने के मूड है? पहनावे पर उन्होंने लिखा था कि लाेगों के पहनावे बदल गए हैं और उस पहनावे में यह पता लगाना मुश्किल हो गया है कि इससे बदन को ढंका जा रहा है या फिर उघाड़ा जा रहा है। सच की तलाश पर उनके शब्द- सच ऐसी भूमि है जिस पर कोई रास्ता नहीं होता और सत्य एक रास्ता है जिसकी कोई भूमि नहीं होती। इसलिए लोग झूठ में अपनी जमीन तलाशते हैं। एक पार्टी से खड़े पैर बेवफाई करने वाला जब दूसरी पार्टी में जाकर वफा के गीत गाता है तो समझ में आता है कि झूठ एक स्वादिष्ट व्यंजन है।