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कंपनी ने बीमित की मृत्यु पर क्लेम रोका, अब 8 साल का 7% दर से ब्याज, पांच हजार मानसिक और तीन हजार परिवाद शुल्क भी देना होगा

3 वर्ष पहले
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भास्कर संवाददाता| श्रीगंगानगर

बीमित व्यक्ति की मृत्यु के बाद कंपनी द्वारा रोके गए भुगतान को अब पीड़ित को 7 प्रतिशत ब्याज सहित मिलेगा। इस संबंंध में स्थाई लोक अदालत के अध्यक्ष सेवानिवृत न्यायाधीश नरेश चुघ, सदस्य अजय मेहता और जेपी गौतम की बैंच ने यह निर्णय सुनाया। आदेश में बीमा कंपनी को पीड़ित को पांच हजार रुपए मानसिक पीड़ा का व्यय और तीन हजार रुपए परिवाद व्यय भी चुकाने को कहा गया है। मामले में परिवादी एल ब्लाक निवासी मुकेश चलाना ने स्थाई लोक अदालत में परिवाद लगाया था। परिवादी ने बताया कि उसके पिता भगवानदास का भारतीय जीवन बीमा की चहल चौक स्थित प्रथम शाखा के कारपोरेट एजेंट के माध्यम से 24-24 हजार रुपए प्रीमियम के दो जीवन बीमा करवाए थे। बीमा करवाने की कुछ अवधी के बाद ही उसके पिता का निधन हो गया। इस पर परिवादी ने बीमा कंपनी पर पॉलिसी का क्लेम भुगतान को दस्तावेज प्रस्तुत किए। बीमा की एक पॉलिसी में परिवादी ने अपनी मां को तथा एक में परिवादी स्वयं नोमिनी था। बीमा कंपनी ने पहले बीमा पॉलिसी के 23961 रुपए उसकी मां को भुगतान कर दिए लेकिन दूसरी पॉलिसी के भुगतान से इंकार कर दिया। इस पर परिवादी ने स्थाई लोक अदालत में परिवाद पेश किया। मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने बीमा कंपनी को ग्राहक सेवा का दोषी पाया और कंपनी को बीमित के नोमिनी को दूसरी पॉलिसी के रोके गए भुगतान को 7 प्रतिशत ब्याज सहित दो माह में भुगतान करने के आदेश दिए।

कंपनी का पक्ष, इस स्कीम में एक व्यक्ति जीवनकाल में 30 हजार तक का ही करवा सकता है बीमा, अदालत ने खारिज किया तर्क
स्थाई लोक अदालत की ओर से इस मामले की सुनवाई में आरोपी बीमा कंपनी ने अपना तर्क दिया। इसमें बताया कि परिवादी ने जीवन मधुर स्कीम का बीमा करवाया था। इस योजना में एक व्यक्ति अपने जीवन में 30 हजार रुपए तक के बीमाधन का ही बीमा करवा सकता है। जबकि परिवादी ने इस तथ्य को छुपाते हुए अपने पिता के 24-24 हजार बीमाधन के दो बीमा पॉलिसी ली। बीमा पॉलिसी में इस संबंंध में नियम आैर शर्तें लिखी हुई थी और इस संबंध में बीमित व उनके नोमिनी को अवगत भी करवाया गया था। इस कारण परिवादी को एक पॉलिसी का पूरा भुगतान किया गया जबकि दूसरी पॉलिसी का 30 हजार के बीमा धन के अनुरूप गणना कर 5241 रुपए का भुगतान किया गया। अदालत ने आरोपी बीमा कंपनी के इस तर्क को खारिज कर दिया। अदालत ने आदेश सुनाते हुए कहा कि बीमा कंपनी की जिम्मेदारी थी कि वह इस गलती को पकड़ती और दूसरा बीमा करते समय इसे सुधारती। इसलिए किए गए बीमा के भुगतान को रोका नहीं जा सकता। कंपनी पीड़ित को 2010 से लेकर आदेश की तिथि तक की अवधी का शेष बचे भुगतान पर 7 प्रतिशत वार्षिक ब्याज का भी भुगतान करे।

बिना शुल्क और बिना अधिवक्ता के भी साक्ष्यों के साथ उपभोक्ता सादे कागज पर भी पेश कर सकता है परिवाद

स्थाई लोक अदालत के सदस्य एडवोकेट अजय मेहता ने बताया कि कोई भी उपभोक्ता जो संबंधित व्यक्ति, संस्था अथवा सरकार से सेवा में कमी से पीड़ित हो, वह स्थाई लोक अदालत में न्याय के लिए परिवाद पेश कर सकता है। स्थाई लोक अदालत में किसी तरह की फीस नहीं लगती और परिवादी को कानूनी सलाहकार को नियुक्त करने की भी जरूरत नहीं है। पीड़ित केवल दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ सादा कागज पर एक प्रार्थना पत्र स्थाई लोक अदालत के अध्यक्ष के नाम लिखकर अपना पक्ष रख सकता है। उसी के आधार पर लोक अदालत निशुल्क सुनवाई कर मेरिट के अनुसार निर्णय सुनाती है। सबसे बड़ी बात यह भी है कि स्थाई लोक अदालत के निर्णय को किसी भी अदालत में अपील नहीं किया जा सकता। संबंधित आरोपी को यह निर्णय की पालना करनी ही होती है।

स्थाई लोक अदालत ने दिए बीमा कंपनी को 2 माह में भुगतान के

आदेश, परिवादी ने अपने पिता की एक ही स्कीम की ली थी दो बीमा पॉलिसी
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