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देश की बैंकों में घपले एवं मेक इन इंडिया मार्का

बैंक में दो तरह से डाका डाला जाता रहा है। पुराना पारम्परिक तरीका तो यह था कि सशस्त्र लोग बैंक में घुसकर डाका डालते...

Danik Bhaskar | Mar 01, 2018, 04:25 AM IST
बैंक में दो तरह से डाका डाला जाता रहा है। पुराना पारम्परिक तरीका तो यह था कि सशस्त्र लोग बैंक में घुसकर डाका डालते थे। यह प्राय: लालच प्रेरित या आर्थिक मजबूरी के कारण होता था। इसमें एक परिवर्तन हुआ अमेरिकन फिल्म ‘बोनी एन्ड क्लॉयड’ से, जिसके डाकू केवल थ्रिल के लिए डाका डालते हैं। वे अपने जीवन से ऊबे हुए लोग हैं। यह कुछ हद तक रोबिनहुड परम्परा का हिस्सा है। रोबिनहुड अमीरों को लूटकर धन गरीबों में बांट देता है। यह डाके का समाजवादी स्वरूप था। ‘बोनी एन्ड क्लॉयड’ से प्रेरित फिल्म में रानी मुखर्जी और अभिषेक बच्चन ने अभिनय किया था। इसी फिल्म में अतिथि कलाकार अमिताभ बच्चन और एश्वर्या राय ने एक नृत्य गीत प्रस्तुत किया था। गुलज़ार का गीत था ‘कजरारे कजरारे तेरे कारे कारे नयना’। आजकल बैंक में डाका नए तरीके से डाला जाता है जो अहिंसात्मक है। इसके लिए कोई बंदूक या पिस्तौल नहीं लगती। इसका आविष्कार भारत में हुआ है। इसमें रिश्वत दी जाती है और बैंक की किताबों में हेरा फेरी की जाती है। इस नए ढंग का जरूरी हिस्सा यह है कि डकैत विदेश यात्रा का पक्का बंदोबस्त करता है और परदाफाश होने के कुछ घंटे पूर्व ही विदेश चला जाता है। डकैती की रकम के बराबर रकम सरकार खर्च करती है इन्हें पकड़ने के प्रहसन में। वे कभी पकड़े नहीं जाते। इनमें एक तो इतना दुस्साहसी था कि देश छोड़ने के पहले केन्द्रीय वित्त मंत्री से मिलने गया था। संभवत: हिसाब किताब का मामला था। यह नए ढंग की बैंक डकैती प्राय: सरकार द्वारा संपूर्णरूप से नियंत्रित बैंकों में की जाती है। एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने विवरण दिया है कि ‘भ्रष्टाचार मुक्त भारत’ में सबसे बड़ा घोटाला बैंकों में किया जाता है गोयाकि सरकार और सरकारी अधिकारी इसमें शामिल रहते हैं। यह अदा कुछ ‘मेरा मुझको अर्पण’ की तर्ज पर किया जाता है। अवाम इस तरह मुतमइन है कि जैसे वे जानते हैं कि लूटा जाना उनका मुकद्दर है। संभवत: वे इस कथा को जानते हैं कि दुष्यंत द्वारा शकुंतला को दी गई अंगूठी मछली निगल गई थी और वही मछली रिश्वत देकर ही मछुआरा राजमहल के रसोइये को बेच पाया था। भारत नाम ही दुष्यंत के पुत्र भरत के नाम से प्रेरित है।

पेरिस की एक हीरा जवाहरात के व्यापारी की दुकान से हीरों की चोरी हो गई। तहकीकात से कोई नतीजा नहीं निकला। ‘ग्रैंड स्लेम’ नामक इस फिल्म के अंतिम दृश्य में उसी दुकान का एक सेवानिवृत व्यक्ति अपनी प|ी के साथ एक रेस्तरां में बैठा है। वह टेबल पर ही हीरों की थैली रखता है। यह वही सेवानिवृत व्यक्ति है जो बताता है कि डाके की रात ही उसने असली हीरों की जगह नकली रख दिये थे और डकैतों को भी उसने ही पूरी जानकारी दी थी। इस पूरे कांड का कर्ता वही था। डकैतों के आपसी झगड़े में हीरों की थैली समुद्र में गिर गई और उन्हें अब डूबा हुआ माल माना जाता है। उसी रेस्तरां में एक मामूली उठाइगिरा थैली लेकर भाग जाता है। वह सेवानिवृत व्यक्ति चोर का पीछा नहीं करता और ना ही पुलिस में शिकायत करता है, वरन् अपनी पहचान छुपाते हुए वहां से चला जाता है क्योंकि वह जानता है कि चोर पकड़ा जायेगा। वह हीरे बेचने जायेगा और उन हीरों को व्यापारी पहचान लेगा। इस फिल्म में मास्टरमाइंड कर्मचारी के हाथ कुछ नहीं लगता।

‘ग्रैन्ड स्लेम’ नामक यह रोचक फिल्म संदेश देती है कि कितनी भी चतुराई से योजना बनाएं, लूट का माल फलता नहीं है परन्तु भारत में हुए बैंक घपलों का माल बकायदा हजम किया जाता है, बैंक डकैती का ग्रैन्ड इंडियन डिजाइन बहुत कामयाब है। कुछ मामले ऐसे हैं कि हमारे जैसा विश्व में कोई नहीं है।

जयप्रकाश चौकसे

फिल्म समीक्षक

jpchoukse@dbcorp.in