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अपने बच्चों में आस्था कैसे विकसित करें?

Sikar News - इस हफ्ते की शुरुआत में मुझे अपने दो गुमे हुए एयरलाइन अपग्रेड वाउचर मिल गए। इससे मैं निम्न श्रेणी का टिकट खरीदकर...

Dainik Bhaskar

Apr 01, 2018, 06:30 AM IST
अपने बच्चों में आस्था कैसे विकसित करें?
इस हफ्ते की शुरुआत में मुझे अपने दो गुमे हुए एयरलाइन अपग्रेड वाउचर मिल गए। इससे मैं निम्न श्रेणी का टिकट खरीदकर उच्च श्रेणी में हवाई यात्रा कर सकता था। चूंकि इनके इस्तेमाल की अंतिम तारीख 31 मार्च 2018 थी, इसलिए मेरी बेटी इनके व्यर्थ चले जाने की संभावना से विचलित थी, क्योंकि वाउचर अंतिम तिथि के नज़दीक मिले थे और इस तरह न सिर्फ उनके इस्तेमाल का मौका हमने गंवा दिया था बल्कि यह सुविधा मैंने उसे तोहफे में तब नहीं दी जब वह इस साल फरवरी में हवाई यात्रा पर थी। मैंने उसे कहा,‘सब अच्छे के लिए ही होता है, हो सकता है भगवान की कोई और योजना हो, इसलिए चिंता मत करो।’ उसने व्यंग से कहा, ‘अपनी लापरवाही को ईश्वर पर मत डालिए डेड।’ मैंने कहा, ‘नहीं, मैं ऐसा कुछ नहीं कर रहा हूूं पर मुझे पूरा यकीन है कि वाउचर खोने के पीछे कोई कारण है।’ फिर उसे मैंने यह कहानी सुनाई, ‘हमें धुलाई की जरूरत है।’कहानी एक माल के बाहर निकलने के द्वार से शुरू होती है, जहां एक 6 वर्षीय लड़की और उसकी मां शॉपिंग के बाद भारी वर्षा रुकने का इंतजार कर रही थीं। वहां खड़े कई लोग परेशान थे और चुपचाप खड़े थे, क्योंकि बारिश ने उनका दिन खराब कर दिया था। अचानक बच्ची की मधुर आवाज ने उस सम्मोहन जैसी स्थिति को भंग किया, जिसने कहा, ‘मम्मी आइए हम बारिश में दौड़कर चले।’ मां ने चौककर कहा, ‘क्या?’ उसने फिर दोहराया, ‘आइए दौड़कर चलें।’ मां ने जवाब में कहा, ‘नहीं बेटी, हम बारिश कम होने तक इंतजार करते हैं वरना हम भीग जाएंगे।’ बच्ची ने बड़े आत्मविश्वास से कहा, ‘नहीं मम्मी हम नहीं भीगेंगे, यही तो आपने आज सुबह कहा था।’ मां ने उसकी ओर देखकर तपाक से पूछा, ‘अाज सुबह मैंने कब कहा कि हम बारिश में दौड़कर जा सकते हैं और भीगेंगे भी नहीं?’

‘आपको याद नहीं। जब आप डेडी से उनके कैंसर के बारे में बात कर रही थीं तो आपने कहा था कि यदि ईश्वर हमें इससे बाहर निकाल सकता है तो फिर किसी भी चीज से निकाल सकता है!’ वहां खड़े लोगों ने और कुछ भी नहीं सुना लेकिन, हर किसी ने बच्ची की यह बात जरूर सुनी। कोई वहां से नहीं गया। हर कोई सोच रहा था कि अब मां क्या करती है? मां ने उसे इस बेकार की बात के लिए डाटा नहीं। वे पहचान गईं कि यह बच्ची की ज़िंदगी में आस्था का, सकारात्मकता का क्षण है। यही वक्त है कि भोले-भाले विश्वास को मजबूती दी जाए ताकि यह खिलकर आस्था में बदल जाए।

मां ने कहा, ‘बेटी तुमने बिल्कुल ठीक कहा। आओ, बारिश मंे दौड़ लगाएं। यदि ईश्वर हमें भिगो देता है तो हो सकता है हमें धुलाई की जरूरत हो।’ और वे बस दौड़ पड़े। दूसरे लोग सिर्फ उन्हें कारों, पानी भरे सड़क के गड्‌ढों के पास से गुजरते और भीगते हुए देखते रहे। लेकिन, पालक के रूप में मां के इस अद्‌भुत व्यवहार ने उनके दिल को छू लिया।यह कहानी सुनने के बाद मेरी बेटी ने कोई बहस नहीं की और हमने वह बात वहीं छोड़ दी। अब फिर वाउचर की कहानी पर लौटते हैं। वाउचर मिलने के दो दिन बाद मुझे खजुराहो के पास एक निजी कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया और मुझे एक पड़ाव के साथ छह घंटे लंबी यात्रा करनी थी अौर दिल्ली व वाराणसी में हवाई जहाज बदलना था, वह अलग। इसके अलावा मेरी उम्र के किसी भी व्यक्ति के लिए इतनी लंबी यात्रा हमेशा कठिन होती है। उन संकरी सीटों में सिकुड़कर बैठना और एक के बाद एक तीन फ्लाइट लेना कोई आसान बात नहीं है। मैं सोच रहा था कि सारे दर्द-तकलीफों के बाद मैं वहां तक कैसे पहुंच पाऊंगा। संयोग देखिए कि मुझे ठीक 31 मार्च को ही यात्रा करनी थी, जिस दिन वाउचर की अंतिम तारीख थी तो वे वाउचर बहुत काम आए और मेरी यात्रा मक्खन जैसी, सुगम हो गई। अब मुझे हवाई जहाज भी नहीं बदलने थे। उच्च श्रेणी की बिज़नेस क्लास में ख्यात ड्रमर शिव मणि के साथ बैठने पर मैंने उनके साथ सेल्फी ली और उसे बेटी को भेजते हुए कहा, ‘याद है, मैंने क्या कहा था? सबकुछ अच्छे के लिए ही होता है और ईश्वर की हमेशा कोई योजना होती है।’ और उसने एक इमोजी के साथ संदेश भेजा, ‘हां।’ भीतर से मैं जान गया कि मैं उसके विश्वास को आस्था में बदलने में कामयाब रहा। फंडा यह है कि अपने विश्वास में अडिग रहकर और संदेह पैदा करने वाले कोई प्रश्न न पूछकर, कभी-कभी हम अगली पीढ़ी में दृढ़ आस्था को जन्म दे देते हैं।

 

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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