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युवाओं की आकांक्षाएं बढ़ीं, उन्हें अच्छे जॉब चाहिए

रोजगार के आंकड़ों पर बहुत बहस छिड़ी हुई है। लोग तीन तरह की बातें करते हैं- आंकड़ों की कमी है, इसपर एकराय नहीं कि चार साल...

Dainik Bhaskar

May 18, 2018, 03:35 AM IST
युवाओं की आकांक्षाएं बढ़ीं, उन्हें अच्छे जॉब चाहिए
रोजगार के आंकड़ों पर बहुत बहस छिड़ी हुई है। लोग तीन तरह की बातें करते हैं- आंकड़ों की कमी है, इसपर एकराय नहीं कि चार साल में रोजगार बढ़ा या घटा है, आर्थिक प्रगति बिना रोजगार के हो रही है। मेरे विचार से बिना रोजगार के ग्रोथ की बात पूरी तरह गलत साबित हुई है। सीएमआईई के महेश व्यास ने अपने लेख में माना है कि 2016-17 में औपचारिक क्षेत्र में 15 लाख नौकरियां पैदा हुईं। सुरजीत भल्ला जैसे लोग तो 2016-17 में डेढ़ करोड़ नई नौकरियों की बात कह रहे हैं। पुलक घोष-रमाकांति घोष ने अपने लेख में ईपीएफओ आंकड़ों के सहारे बताया कि 2016-17 के दौरान 70 लाख नए रोजगार पैदा हुए हैं। लेबर ब्यूरो के आंकड़े देखने के बाद यह कहना कि नौकरियां पैदा ही नहीं हुई हैं, तथ्यहीन है।

आंकड़ों की कमी की बात कुछ हद तक सही है। नीति आयोग ने इस दिशा में दो-तीन कदम उठाए हैं। आयोग के सुझाव पर ईपीएफओ और ईएसआई के आंकड़ों को हर महीने जनता के बीच रखा जाएगा। अनौपचारिक क्षेत्र रोजगार में 80% तक योगदान देता है। नीति आयोग में पिछले वर्ष मेरे पूर्ववर्ती अरविंद पनगढ़िया ने टास्कफोर्स का गठन किया था। अब हर तिमाही हाउसहोल्ड सर्वे करके आंकड़ा जुटाए जाएंगे। यह काम सांख्यिकी मंत्रालय को सौंपा गया था। यह काम 2017 में शुरू कर दिया गया है। जमीनी स्तर पर सर्वे जारी है। चार तिमाही का पहला पूर्णतया वैज्ञानिक डेटा दिसंबर 2018 या जनवरी 2019 तक मिल जाएगा। इसके बाद अनौचारिक क्षेत्र में रोजगार के आंकड़ों की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। अभी छोटी-छोटी इकाइयां खोलने वाले, होटल चलाने वाले, चार्टर्ड एकाउंटेंट, वकील, बस-ट्रक ड्रायवर इन सबके आंकड़े कहीं जमा नहीं हो रहे हैं। नीति आयोग की कोशिश है कि जिन क्षेत्रों में रोजगार की अभी तक गणना नहीं होती थी, उनका हर तिमाही डेटा जारी करे। इससे पता चल पाएगा कि नियोक्ताओं ने असल में कितने रोजगार दिए। सेल्फ एंम्प्लॉयर की भी श्रेणी है। मुद्रा योजना में जो लोन दिया गया उससे लोग कारोबार बढ़ाते हैं। इससे बढ़ने वाले रोजगार की गणना कहीं नहीं होती है। इसलिए रोजगार नहीं बढ़ने की बात गलत है। जरूरत रोजगार की क्वालिटी बेहतर करने की है। हमारे युवा पढ़-लिख गए हैं। उनकी आकांक्षाएं बड़ी हो गई हैं। उनके लिए अच्छी नौकरियां तेजी से बढ़ानी होंगी। नैसकॉम और इंडस्ट्री बॉडी से भी रोजगार के आंकड़े लेंगे। 2008 से मैन्युफैक्चरिंग के 8 क्षेत्रों के आंकड़े लिए जा रहे हैं। तब इसका मकसद यह जानना था कि वैश्विक मंदी का एक्सपोर्ट पर क्या असर पड़ रहा है। लेकिन इनका सैंपल साइज छोटा है। 11 हजार सैंपल से आंकड़े लिए गए थे। यह रोजगार मापने का सही आधार नहीं हो सकता। जिस अर्थव्यवस्था में 58% हिस्सा सर्विस सेक्टर का हो उसके आंकड़े रोजगार में शामिल नहीं करना गलत ही है। रोजगार के लिए नई पॉलिसी बनानी पड़ेगी। रिटेल क्षेत्र का आधुनिकीकरण करना पड़ेगा। निर्माण क्षेत्र में तेजी लानी होगी। कृषि में खेती से लेकर एग्रो प्रोसेसिंग, डेयरी व मंडियों का आधुनिकीकरण करना होगा। एक अनुमान के मुताबिक 92 हजार करोड़ का कृषि उत्पादन बर्बाद हो जाता है। यह बर्बादी रुकेगी तो इससे भी हजारों रोजगार पैदा होंगे। एक और बात, इस समय ऑटोमेशन की लहर चल रही है। इसका नौकरियों पर असर होगा लेकिन सरकार तकनीक और रोजगार दोनों को साथ बढ़ाने के प्रयास कर रही है। हम नई तकनीक को स्वीकार न करें ऐसा नहीं हो सकता।

इकोनॉमी

राजीव कुमार, उपाध्यक्ष नीति आयोग

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