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माहे रमजान का पहला जुमा और रोजा आज, इबादतों का दौर शुरू

भास्कर संवाददाता. झुंझुनूं. रहमतों एवं बरकतों के महीने रमजान उल मुबारक के पहले जुमे की नमाज शुक्रवार को होगी।...

Bhaskar News Network | Last Modified - May 18, 2018, 04:45 AM IST

भास्कर संवाददाता. झुंझुनूं.

रहमतों एवं बरकतों के महीने रमजान उल मुबारक के पहले जुमे की नमाज शुक्रवार को होगी। जिले के कुछ स्थानों पर गुरुवार को भी रोजे रखे गए। अधिकांश स्थानों पर शुक्रवार को पहला रोजा रखा जाएगा। गुरुवार रात ईशा की नमाज के बाद इमाम ने तराबी पढ़ाई। रमजान माह में इबादत का दौर शुरू हो गया है। शाम को मगरीब की नमाज के बाद लोगों ने रमजान का चांद देखने की कोशिश की। इससे पहले मुस्लिम भाइयों ने रमजानुल मुबारक के रोजे का इस्तकबाल करने के लिए सेहरी व इफ्तारी के सामान का इंतजाम किया। इबादतों का दौर शुरू हो गया है। शुक्रवार दोपहर में जुमे की नमाज होगी।

झुंझुनूं शहर काजी शफीउल्लाह सिद्दीकी का कहना है कि इस्लाम में रोजे की बड़ी अहमियत है। इस महीने में अल्लाह की रहमतें और बरकतें बरसती हैं। इस माह में ईमान वाले बंदों का रिज्क बढ़ा दिया जाता है। सभी अहले ईमान वाले इस महीने की कद्र करें। नेक काम करे, बुराइयों से बचें और ज्यादा से ज्यादा इबादत करें।

इस्लामपुर | मुस्लिम भाइयों को जिस मुकद्दस महीने का सालभर से बेसब्री से इंतजार था वो रमजान का पाक महीना शुरू हो गया है। अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है कि ‘ऐ इमान वालो! तुम पर रोजे फर्ज किए गए जैसे तुमसे अगलों पर फर्ज हुए थे ताकि तुम परहेजगार बनो। हर आकिल, बालिग मुसलमान मर्द और औरत पर माहे रमजान के रोजे रखना फर्ज है। रोजे के लिए नियत का दुरूस्त व अदायगी में इख्लास होना जरूरी है। अल्लाह का हम पर कितना बड़ा अहसान है कि उसने हमें अपने प्यारे हबीब के सदके में माहे रमजान जैसा फजीलत वाला महीना अता फरमाया। यह महीना इसलिए भी खास है कि इसमें लोगों की हिदायत व रहनुमाई के लिए पाक व मुकद्दस किताब कुरआन शरीफ नाजिल हुआ।

शाम को मगरीब की नमाज के बाद लोगों ने रमजान का चांद देखा और एक दूसरे को मुबारकवाद दी

केकूकेक

रोजा क्या है : रोजे की हकीकत रुकना है। जैसे पेट को खाने-पीने से रोके रखना, आंखों को हराम चीजों को देखने से, कान को गिबत ( चुगली ) सुनने से, जबान को बेहूदा बातें करने से और जिस्म को हुक्मे इलाही की नाफरमानी से रोकने का नाम रोजा है। जब इंसान इन तमाम बातों पर पाबंदी से अमल करेगा तब ही वो हकीकत में सही रोजेदार होगा अन्यथा उसका भूखा-प्यासा रहना किसी काम का नहीं।

रमजान के एक रोजे की फजीलत : हुजूर ने इरशाद फरमाया कि जो शख्स जान-बूझकर बगैर किसी शरई मजबूरी के रमजान का एक रोजा भी छोड़ दे तो रमजान के अलावा तमाम उम्र रोजा रखने पर भी उसका बदला नहीं हो सकता।

नफिल का सवाब फर्ज के बराबर : रमजान माह में इबादत का सवाब बढ़ा दिया जाता है नफील का सवाब फर्ज के बराबर और फर्ज का सवाब सत्तर गुना तक बढ़ा दिया जाता है। हदीसे पाक में है कि इस महीने में एक बार दरूद शरीफ पढ़ने वाले को एक लाख दरूद शरीफ पढ़ने का सवाब मिलता है। रमजान में रब की रजा के लिए शौक से रोजे रखें, कुरआन मजीद की तिलावत करें और तराबी की नमाज अदा करें।

सहरी में बरकत : रोजा रखने के लिए भोर यानि सुबह सादिक होने से पहले जो कुछ खाया-पिया जाता है उसे सहरी कहते हैं। अल्लाह के रसूल ने फरमाया कि सहरी खाया करो कि इसमें बरकत है। इस पाक माह में शैतान जंजीरों में जकड़ दिये जाते हैं।

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