ये परंपराएं शेखावाटी की होली को बनाती हैं खास
फाल्गुन माह की शुरुआत के साथ ही गांव के चाैक में डांडारोपण किया जाता है। इसी दिन से महिलाएं घर में हाेली के लाेक गीत गाने लगती हैं। गीताें के बाेल परिवार के पुरुष एवं महिला सदस्याें के नाम से बनाए जाते हैं। हाेली के गीताें के साथ घराें में माहाैल शादी जैसा हाेने लगता है।
चंग नृत्य : हाेली के एक माह पहले से ही शहर-कस्बाें में युवक चंग नृत्य, धमाल, स्वांग अादि कार्यक्रम करते हंै। हाेलिका दहन के समय सभी सामूहिक रूप से धमाल की प्रस्तुतियां देते हैं। धमाल के बाेल राजा-रजवाड़ाें के घरानाें से जुड़े हुए हाेते हैं। चंग की प्रस्तुति के साथ लाेक परम्पराअाें पर व्यंग्यात्मक दाेहे भी बाेले जाते हैं। ये कार्यक्रम बस्ती के मुख्य चाैक में एक माह तक देर रात तक हाेते हैं।
पकवान : हाेली पर्व के अवसर पकवान भी तय होते हैं। ज्यादातर घरों में खीर-चूरमा, गुलगुले, हलवा, मूंग, दाल अादि पकवान बनाने का रिवाज है। हाेली के दिन हर घर में चावल-भात प्रमुखता से बनाया जाता है। हाेली काे भाेग भी चावल भात का ही लगाया
जाता है।
भस्मी की पूजा : गांव-कस्बाें में सभी समाजों के लाेग एकजुट हाेकर हाेलिका दहन करते हैं। हाेली के दूसरे दिन दहन के स्थान पर गांव की सभी महिलाएं एकत्रित हाेती हैं। जहां पर लाेक गीताें के प्रस्तुतियाें के साथ हाेली की
भस्मी की पूजा कर घर लेकर अाती हंै। जिन्हें परिवार की खुशहाली की कामना के लिए घराें में लाया जाता है