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देश में आर्किटेक्ट का पहला नोबल इन्हें

शिक्षा- जेजे स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर, मुंबई परिवार- प|ी, तीन बेटियां, तेजल पंतकी (टेक्सटाइल डिजाइनर), राधिका कठपालिया...

Danik Bhaskar | Mar 10, 2018, 07:15 AM IST
शिक्षा- जेजे स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर, मुंबई

परिवार- प|ी, तीन बेटियां, तेजल पंतकी (टेक्सटाइल डिजाइनर), राधिका कठपालिया (आर्किटेक्ट), मनीषा (पेंटर), नातिन- खुशनू और जेसिका पंतकी

क्यों चर्चा में- आर्किटेक्चर का नोबल पाने वाले पहले भारतीय बने हैं।

बांग्लादेश की नेशनल असेम्बली अहमदाबाद आईआईएम की डिजाइन में ज्यादा अंतर नहीं मिलेगा। इन्हें लुई कान ने डिजाइन किया था। अहमदाबाद आईआईएम में लुई के साथ थे, बीवी दोशी, जिन्होंने बाद में आईआईएम बेंगलुरू भी डिजाइन किया। बेंगलुरु आईआईएम को उन्होंने फतेहपुर सीकरी की तर्ज पर डिजाइन किया। इससे फायदा यह हुआ कि कक्षाएं और संस्थान का प्रशासन दोनों ही प्रकृति का आनंद लेते हुए कार्य कर सकते हैं।

बालकृष्ण विट्‌ठलदास दोशी के पिता और चाचा फर्नीचर बनाते थे। लिहाजा बालकृष्ण की भी ड्राइंग अच्छी थी, दोस्तों के कहने पर जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में पढ़ने चले गए। जेजे से पासआउट होने के बाद फ्रांस के ली कार्ब्यूसर के साथ काम किया। चार वर्ष काम करने के बाद उन्होंने नई दिल्ली में किफायती घरों को डिजाइन किया। फिर नई दिल्ली स्थित फैशन इंस्टीट्यूट बनाया। इसी के चलते 1976 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। अहमदाबाद के इनके अपने बालकृष्ण ट्रस्ट के लिए बनाई गई इमारत ‘संगत’ उनकी बेहतरीन कारीगरी का नमूना है। इसकी छत गोल है, ऊपर चाइना मोजाइक टाइल्स लगी हंै, जो न पानी रुकने देती है और न ही गर्मी होने देती है। प्रकाश इस तरह से भवन में आता है कि वह टकराकर पूरे कमरे में उजाला करता है। चूंकि छत गोल है, इसलिए इनके पास कुंड बनाए हैं, ताकि ऊपर से पानी गिरकर इन कुंडों में जमा हो जाए।

बात 1980 के दशक की ही है। कोलकाता के कनोरिया परिवार की उर्मिला कनोरिया ने शांतिनिकेतन की तर्ज पर अहमदाबाद में भी आर्ट सेंटर शुरू करने का फैसला किया। काम सौंपा गया बीवी दोशी को। दोशी ने इसे इतनी तल्लीनता से बनाया है हर कमरे में मध्ययुग की कारीगरी झलकती है। पुणे के रविवार पेठ में पले बढ़े दोशी बताते हैं कि उस दौर में लकड़ियों की बालकनी, खिड़कियां और भवन होते थे। इसका उन पर गहरा असर रहा है। इनकी तीन बेटियां हैं।