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निरक्षर हिरीदेवी ने पोषण वाटिका व सका बेन ने सिलाई सीख जीवन में भरे खुशियों के रंग

एक वर्ष पहले
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उमंग और उत्साह का त्योहार होली पर महिलाओं ने जीवन में संघर्ष करते हुए खुशियों के रंग भरे हैं, जो अब परिवार के साथ अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत बनीं हुई है। सिरोही जिले के मोरस की हिरी बाई और काछौली की सका बेन की जागरूकता ने उन्हें खुद तो आत्मनिर्भर बनाया है, साथ ही वे दूसरों को भी आत्मनिर्भर बनाने का कार्य कर रही है।

इन दोनों महिलाओं को कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों ने ग्रामीण क्षेत्र से ढूंढा और इनके हुनर को पंख भी लगाए। कृषि वैज्ञानिकों ने हिरीबाई को जैविक खेती से पोषण वाटिका में मौसमी सब्जियां उगानी सिखाई और े काछौली की सका बेन को केंद्र के कौशल आधारित कृषक प्रशिक्षण योजना से सिलाई कार्य सिखाया। दोनों महिलाओं को प्रशिक्षण
देकर इस कदर बनाया कि ये अपने परिवार का लालन-पालन करने के साथ परिवार में खुशियों के रंग भर रही हैं। अपने-अपने गांव में अन्य महिलाओं के लिए भी रोल मॉडल के रूप में उभरकर सामने आ रही हैं। इनके आय में भी बढ़ोतरी हुई है।

सका बेन : पहले सिलाई सीखी, 100 से ज्यादा लड़कियों को दे चुकी है प्रशिक्षण, सालाना आय भी हुई 80 हजार

हिरी बाई : कृषि वैज्ञानिकों ने दिया पोषण वाटिका का प्रशिक्षण, तीन से चार महीनों में बढ़ी 40 हजार रुपए आय

बदलाव की दो कहानी

दोनों महिलाओं ने अपनी मेहनत से पाया मुकाम

कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से मोरस की हिरी बाई को पोषण वाटिका में और काछौली की सका बेन को कौशल आधारित कृषक प्रशिक्षण योजना के तहत सिलाई का प्रशिक्षण देकर तैयार किया। आज दोनों अपने-अपने गांव में महिलाओं के लिए प्रेरणा स्त्रोत बनीं हुई हैं। यह सब उनके खुद के हुनर से संभव हो पाया है।
-डॉ. अंकिता शर्मा, विषय विशेषज्ञ, कृषि विज्ञान केन्द्र सिरोही

सिरोही. सका बेन ने सिलाई सीखी और अब बालिकाओं को दे रही प्रशिक्षण।

काछौली की सकाबेन जो थोड़ा पढऩा लिखना जानती है और उनका परिवार पूरी तरह खेती पर ही निर्भर है। सकाबेन भी कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों के संपर्क में आई, तो कौशल आधारित कृषक प्रशिक्षण योजना के तहत सिलाई का हुनर सीखा। इस दौरान कृषि विज्ञान केन्द्र से सिलाई मशीनों का वितरण किया गया। इससे सकाबेन में सिलाई सिखने की और प्रेरण मिली। वह काछौली के एक सिलाई केंद्र से जुड़ गई। कृषि विज्ञान केन्द्र के सिलाई प्रशिक्षण में भाग लेकर सिलाई कार्य सीख गई। इसके बाद गांव में धीरे-धीरे सिलाई केंद्र में सिलाई सिखाने का कार्य शुरू किया। प्रतिदिन 10 से 20 लड़कियों के सिलाई बैच शुरु किए और इस प्रकार 7 हजार रुपए महीने की कमाई करने लगी। सकाबेन अब तक 100 से ज्यादा लड़कियों को सिलाई का अभ्यास करा चुकीं है और सिलाई कला से ही उनकी सालाना आय 80 हजार रुपए हो गई है।


पिंडवाड़ा तहसील के मोरस गांव की आदिवासी महिला हिरीबाई किसान है और अनपढ़ है। साथ ही कोई हुनर भी नहीं आता था जो आमदनी का जरिया बने। हिरी बाई का पारिवारिक व्यवसाय कृषि है, लेकिन इससे ज्यादा आय नहीं होती थी। हिरी बाई कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों के संपर्क में आईं। कृषि विज्ञान केन्द्र से पोषण वाटिका का प्रशिक्षण लिया और विभिन्न प्रकार की मौसमी सब्जियों को उगाने का तरीका सीखा। कृषि विज्ञान केन्द्र से उसने मौसम के अनुसार सब्जियां उगाना, उसकी देखभाल एवं परिवार के साथ उससे रुपए कमाना सीखा। उन्होंने 400 वर्ग मीटर से भी अधिक की भूमि पर सब्जियां उगाई और प्रशिक्षण के 3 से 4 महीने के अंतर में ही एक छोटी सी दुकान लगाकर 40 हजार रुपए से भी अधिक का मुनाफा कमाया। जबकि पहले की कमाई महज 12 हजार रुपए थी। साथ ही रोजाना की 1 से 2 किलो सब्जियां अपने परिवार में भी उपयोग कर रही है।

सिरोही. हिरी बाई ने पोषण वाटिका बना जैविक खेती कर उगाई सब्जियां।
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