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सिराेही जिले में आदिवासी क्षेत्र की महिलाएं पांच साल बाद फिर बना रहींप्राकृतिक रंग, इस बार होली पर खूब उड़ेगा पलाश के फूलों से बना गुलाल
इस होली पर जिले में कुछ खास है और वह यह है कि आदिवासी व पहाड़ी क्षेत्र में होने वाले केश यानी, पलाश के फूलों का रंग इस बार फिर से लौट आया है। यहां की महिलाओं ने प्राकृतिक रंगों का उपयोग करने की पहल की है। दरअसल, जिले के पिंडवाड़ा और आबूरोड के पहाड़ी क्षेत्र में काफी संख्या में केशू के फूल होते हैं। करीब पांच साल पहले तक आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में इस परंपरा को बंद कर दिया गया था, लेकिन इस बार फिर से महिलाओं ने इससे प्राकृतिक रंग बनाना शुरू किया। यहां तक कि इन फूलों से गुलाल तक बनाया जाता है। इससे बनी गुलाल में महक के लिए नीलगिरी व आम के पत्ते तक मिलाए जाते हैं।
पहले बाजारों में भी बिकने आते थे पलाश के रंग
पहले बिकने आते थे रंग
यहां की महिलाओं ने बताया कि कुछ साल पहले तक इन फूलों, इनके बीज व रंगों को सिरोही जिले के अलग-अलग बाजारों में बिक्री के लिए लेकर जाते थे, लेकिन कुछ साल पहले इसे बंद कर दिया गया। अब फिर से यह शुरू हुआ है। आबूरोड से अंबाजी जाने वाले मार्ग पर होली से पहले ही इन फूलों की बिक्री शुरू हो गई।
भास्कर व सेंटर फॉर माइक्राफाइनेंस की पहल पर फिर शुरू की रंग बनाने की परंपरा: आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में काम करने वाली स्वयंसेवी संस्था सेंटर फॉर माइक्रो फाइनेंस व दैनिक भास्कर की पहल पर पिंडवाड़ा के विभिन्न गांवों में बनाए जल समूह के साथ मिलकर प्राकृतिक रंग बनाने की पहल शुरू की। साथ ही 34 पेयजल परियोजनों के जल समूहों से जुड़े ग्रामीणों को मुहिम से जोड़ा है।**
ऐसे बनाते हैं प्राकृतिक रंग
कुंडाल गांव के जल समूह की सदस्य अमीया बाई ने बताया कि इस क्षेत्र में पलाश के रंग प्रचलन में हैं। इन फूलों को रात में उबाल कर रख देते हैं। सुबह उबाले फूलों को पीसकर सुखाते हैं अाैर प्राकृतिक गुलाल बनाते हैं। पीसे हुए फूलों को पानी में घोलते हैं ताे इससे नारंगी रंग बनता है। उन्होंने बताया कि अायुर्वेद में भी इसका उपयाेग हाेता है।