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जैन समाज के सभी पर्वों में पर्यूषण का अपना महत्व है

पर्यूषण का जैन समाज में बहुत बड़ा महत्व है। पर्व का मतलब पवित्र दिन होता है। जिस दिन पवित्र आराधना, साधना की जाती है...

Danik Bhaskar | Sep 12, 2018, 06:32 AM IST
पर्यूषण का जैन समाज में बहुत बड़ा महत्व है। पर्व का मतलब पवित्र दिन होता है। जिस दिन पवित्र आराधना, साधना की जाती है उस पर्व को पर्यूषण पर्व कहते हैं। सांसारिक जीवन में दो प्रकार के पर्व होते है एक लौकिक और दूसरा लोकोत्तर पर्व। लौकिक पर्व में उत्साह के साथ व्रत, अनुष्ठान किया जाता है उसी प्रकार लोकोत्तर पर्व को पर्यूषण पर्व कहते हैं। इसके अंदर राग द्वेष को मिटा कर के परमात्मा के नजदीक पहुंचने का जो दिन होता है वह पर्यूषण पर्व है। वैसे बहुजन्य पर्व, लोक जन्य पर्व, विजय पर्व तीन और तीन प्रकार के पर्व भी होते हैं। इन दिनों में आदमी में परिवर्तन आता है। लौकिक पर्व में आमोद प्रमोद, घूमना फिरना, खाना पीना, मौज शौक होता है, लेकिन जो लोकोत्तर पर्व होता है इसमें लोगों द्वारा जम, त्याग, अनुष्ठान समर्पण और परमात्मा के पास जाने की भावना होती है। इन दिनों में आदमी अपने कर्मों को काट कर परमात्मा से मिलना चाहता है। इसलिए यह जैनियों का सबसे महत्वपूर्ण पर्व कहलाता है।

(जैसा कि उन्होंने दिलीप द्विवेदी को बताया)

परिचय

प्रखर वक्ता साध्वी डॉ चंद्रप्रभा मसा

गुरु-मधुकर केशरी मिश्रीमल मसा

जन्म- 4 सितंबर 1968 में बीकानेर के सूरजसिंहपुरा

दीक्षा- 18 मई 1986 में सोजत सिटी में