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पति और बड़े बेटे की मौत के बाद 60 साल की हंजा ने शुरू किया कारोबार

बांगड़ स्कूल मैदान में लगे अमृता हाट बाजार में पाली समेत प्रदेश के अलग-अलग जिलों से करीब 100 महिला व्यापारी अपने...

Dainik Bhaskar

Feb 09, 2018, 07:35 AM IST
पति और बड़े बेटे की मौत के बाद 60 साल की हंजा ने शुरू किया कारोबार
बांगड़ स्कूल मैदान में लगे अमृता हाट बाजार में पाली समेत प्रदेश के अलग-अलग जिलों से करीब 100 महिला व्यापारी अपने उत्पाद बेचने आई हैं। इन सभी महिला व्यापारियों के संघर्ष की कहानियां और किस्से भी प्रेरणास्पद हैं। इनमें से एक है सुमेरपुर के कोलीवाड़ा निवासी 60 साल की हंजा देवी। वे पहली बार अमृता हाट बाजार में आई है। दरअसल, चार साल पहले हंजा के पति नेनाराम की मौत हो गई थी, जो कपड़े व बच्चों के खिलौने बेच अपना घर चलाते थे। इसके बाद बड़े बेटे की मौत। ऐसे में परिवार चलाना हंजा के लिए किसी मुश्किल से कम नहीं था। फिर भी 60 साल की उम्र में उन्होंने अपने पति के ही व्यापार को चलाने का निर्णय लिया और 4 हजार की लागत से बच्चों के कपड़े और खिलौने से व्यापार को शुरू किया। अब हर साल वे करीब 1.50 लाख से अधिक का कारोबार करती हैं। इनके परिवार में एक बेटा और उसकी बहू है, जो स्टूडियो का काम करता है। इसके अलावा जय लक्ष्मी ग्रुप से जुड़कर वे इस उम्र में भी पानी की बोतलें तैयार करने करने के साथ गहनों, कलश व पूजा के आर्टिफिशयल नारियल पर मोती लगाने का काम करती है।

मुंबई में इमीटेशन कारोबार में हुआ घाटा तो गांव में 1500 रुपए से की शुरुआत

अब हर माह 1 लाख का व्यवसाय करता है तखतगढ़ का दंपती

मुंबई में इमीटेशन ज्वैलरी के कारोबार में घाटा हुआ तो तखतगढ़ के दंपती ने हार नहीं मानी। महज 1500 रुपए से अपना प्रोडक्शन शुरू किया और आज हर महीने करीब 1 लाख से अधिक का कारोबार करते हैं। मेले में आए पारसमल और उनकी प|ी हुलीदेवी ने बताया कि वह 20 साल से इस व्यापार से जुड़े हैं। मुंबई में भी इनका व्यापार था, लेकिन व्यापार में घाटा होने और पारसमल की तबीयत सही नहीं होने पर वे परिवार के साथ तखतगढ़ आ गए और यहां से फिर से व्यापार शुरू किया।

रानी की लाडूदेवी विकलांग होने से मजदूरी नहीं कर सकती थी, शुरू किया आेरनी का व्यापार

दिनभर की मेहनत में 50 से 100 रुपए ही मजदूरी मिलती थी, अब शुरू किया अपना व्यापार

रानी की लाडूदेवी दिव्यांग है, पति मजदूरी करते हैं। लाडूदेवी दिव्यांग होने की वजह से मजदूरी नहीं कर सकती इसलिए उन्होंने घर से ही ओरनी बनाने का काम शुरू किया। मेले में आने से पहले रानी गांव की यह महिला आेरनी पर मांडना और उन्हें तैयार कर दुकानदार को देती थी। इस दौरान वह जय भवानी स्वयं सहायता समूह से जुड़ी। दिनभर की मेहनत में 50 से 100 रुपए ही मजदूरी मिलती थी। इसके बाद उन्होंने अपना व्यापार करने की सोची। मेले से ही वह अपने इस व्यापार को शुरू कर रही है।

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