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आवां में आज अकाल व सुकाल का होगा निर्णय, लोग उसी के अनुरूप करेंगे बोआई

Dainik Bhaskar

Jan 14, 2019, 07:05 AM IST

Tonk News - महावीर बैरवा/ अमितेष भारद्वाज| टोंक/ देवली कहने और सुनने में भले ही विश्वसनीय ना लगे पर यह कटु सत्य है कि आवां...

Tonk News - rajasthan news today the famine and the famine will be decided in the voice
महावीर बैरवा/ अमितेष भारद्वाज| टोंक/ देवली

कहने और सुनने में भले ही विश्वसनीय ना लगे पर यह कटु सत्य है कि आवां कस्बे में मकर संक्राति का दिन पूरी दुनिया में खास है। इसकी वजह इस दिन सदियों से चला आ रहा फुटबाल की तरह खेला जाने वाला कस्बे का पारंपरिक अनोखा खेल दड़ा है। इस दडे का वजन 80 किलो है। इस खेल की खास बात यह है कि इसमें ना तो कोई फिक्स नाप का गोल पोस्ट होता है और ना फुटबॉल खेल की तरह कोई गोल कीपर व रैफरी होता है। फिर भी बिना किसी गिला-शिकवा के खेले जाने वाले इस खेल में आवां और दूनी दरवाजे के नाम से सदियों से गोल पोस्ट निर्धारित है। कस्बे के आस-पास के बारह पुरो के नाम से पहचाने जाने वाले गुर्जर बाहुल्य गांवों के सभी धर्म,जाति के लोग सौहार्द से इस खेल को बडे उत्साह से खेलते है। दर्शकों के रुप में आवां कस्बे समेत आस-पास के गांवों से सजधज कर आने वाली महिला-पुरुषों एवं बच्चों आदि की भीड़ हुटिंग करती रहती है। अब तक की जानकारी के अनुसार इस तरह का अचंभित करने वाला खेल दुनिया में कई नहीं खेला जाता है। इसके बावजूद इस खेल का नाम ना तो लिम्का बुक में है और ना गिनीज बुक में है। ऐसे में जिले ही नहीं प्रदेश, देश के लिए गौरवमयी इस खेल को अधिकारिक स्तर पर अव्वल दर्जा नहीं मिलने का मलाल इस कस्बे समेत क्षेत्र के लोगों को आज भी है। इस खेल के मायने यही खत्म नहीं होते है। सब लोग जिस तरह से लोग इस खेल का शुरू होने का इंतजार करते हैए उसी तरह इसके खत्म होने का इंतजार भी करते है। इसकी मुख्य वजह है इस खेल के परिणाम पर देश में अकाल और सुकाल का पता लगना है। दोपहर 12 बजे गढ से खेलने के लिए लाए जाने वाले इस दडे को करीब ढाई-तीन घंटे तक खेला जाता है।

टोंक| आंवा में इस दड़े से खेलेंगे हजारों खिलाड़ी।

इसके निर्णय के अनुसार ही क्षेत्र के लोग करते है फसलों की बोआई

फुटबाल आकार में बना करीब 80 किलो वजनी दडा खेलते समय अखनियां दरवाजे के पार हो जाता है तो देश में अकाल का संकेत माना जाता है और दड़ा खेलते हुए दूनी दरवाजे को पार कर जाता है तो सुकाल का प्रतीक माना जाता है। आवां कस्बे के आस-पास के लोग तो इसके निर्णय के अनुसार ही फसलों की बुआई करते है।

परंपरा का खेल बन चुका है दड़ा

इस खेल में यूं तो नया कुछ भी नहीं है सदियों से खेला जाता हैए लेकिन यह भाईचारे व राजस्थानी परपंरा का अनूठा खेल है। उपखंड के आवां कस्बे में हर साल की तरह गांव के गोपाल जी भगवान के मंदिर चौक में आस.पास के बारहपुरो के ग्रामीण अपनी राजस्थानी पोशाकों मे सज.सवर कर इस रोचक व अद्भुत खेल को खेलने मकर संक्राति के दिन सुबह दस बजे से ही आने लग जाएगें। जब यह चौक इन रंग.बिरंगे सजे देहाती ग्रामीणो व नौजवानों से खचाखच भर जाएगा। तब शुरू हो जाएगा यह खेल।

गढ से निकलता है दड़ा

परंपरा के अनुसार सदियों से इस खेल का आयोजन आवां रियासती गढ से जुडे सदस्य करते है। अभी भी उनके परिवार के बडे सदस्य गढ से इस दड़े को पैर से धकेलने की रस्म पूरी कर गोपालजी के चौक में खेलने के लिए भेजते है। इसे टाट से बनाते है। इसकी बुनाई भी बेहतरीन है। चारों और रस्सियों बंधा होता है। यह करीब 80 किलो वजनी होता है और एक जने के पैर से यह आगे खिसकता नहीं है।

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