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राजपूतों के बाद अब मुस्लिम नेता भी पद्मावती के विरोध में उतरे, CBFC की मुश्किलें बढ़ीं

पद्मावती फिल्म विवाद: मेवाड़ की 441 साल पुरानी सामाजिक समरसता कायम रखने की पहल

Dainik Bhaskar

Jan 02, 2018, 01:27 AM IST
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उदयपुर. राजपूतों के बाद अब मुस्लिम समुदाय के नेता भी पद्मावती फिल्म के विरोध में उतर आए हैं। इनमें उदयपुर, जयपुर, अजमेर, राजसमंद सहित कई शहरों के प्रमुख मुस्लिम नेताओं ने कहा है कि पद्मावती फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी का जो चरित्र-चित्रण किया जा रहा है, उससे इस आशंका को बल मिलता है कि इस फिल्म के रिलीज होने के बाद राजस्थान में शरारती तत्व हिन्दू-मुस्लिम रिश्तों और राजपूत-मुस्लिम रिश्तों में कड़वाहट घोल सकते हैं। साल 2018 चुनावी साल है और इस कारण इस फिल्म से सांप्रदायिक विभाजन में सुकून तलाश करने वाले तत्वों को फायदा उठाने से नहीं चूकेंगे। एेसे में फिल्म को पूरी एहतियात बरतने के बाद ही रिलीज किया जाना उचित होगा।

- अंजुमन तालिमुल इस्लाम उदयपुर के मौलाना-मुफ्ती बद्रे आलम साहब, सदर मोहम्मद खलील, अंजुमन राजसमंद के सदर फीरोज वकील, साहित्यकार कमर मेवाड़ी आदि लोगों ने कहा है कि हिंदू-मुस्लिमों की भावनाओं आहत कर माहौल बिगाड़ने वाली फिल्म पद्मावती को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता। इससे मेवाड़ के 441 साल पुराने सामाजिक समरसता के इतिहास की मिसाल देश-दुनिया में पेश की जाती है।

- मेवाड़ी और अन्य नेताओं के अनुसार, महाराणा प्रताप के सेनापति हकीम खां सूर ने 18 जून 1576 को मुगल बादशाह अकबर से हल्दी घाटी युद्ध में मुकाबला किया था।

रिकॉल : अजमेर दरगाह दीवान ने भी किया था विरोध का आह्वान
- ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह अजमेर के दीवान सैयद जैनुल्लाब्दुन ने फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली की तुलना विवादित मुस्लिम लेखक सलमान रुश्दी, तसलीमा नसरीन और तारेक फतह से की।

- उनका कहना था कि भंसाली भी इन विवादित मुस्लिम लेखकों की तरह धार्मिक भावनाओं को आहत करने पर आमादा है। फिल्म से राजपूतों के साथ-साथ मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचेगी।

उदयसिंह ने बाज बहादुर की मदद की तो प्रताप के सेनापति थे हकीम खां सूर
- महाराणा उदयसिंह ने अकबर से परेशान मांडू के सुलतान बाज बहादुर को न केवल शरण दी थी, बल्कि उन्हें सैनिक सहायता देकर अकबर को पराजित करने में भी सफल रहे थे। हल्दीघाटी युद्ध का एक कारण यह भी था। अकबर इसीलिए महाराणा से नाराज था, लेकिन बाज बहादुर को मदद करने के समय वह अफगान मोर्चे पर था।

- सौहार्द की इसी परंपरा को अागे रखकर प्रताप ने हकीम खां सूर को अपना एक प्रमुख सेनापति बनाया था और उन्हें शस्त्रागार का प्रभार भी सौंपा।

'राजपूतों की हद से ज्यादा तारीफ और मुस्लिम विरोधी डायलॉग बिगाड़ सकते हैं माहौल'

- फिल्म पद्मावती की रिव्यू कमेटी में शामिल रहे मेवाड़ के पूर्व राजघराने से जुड़े अरविंद सिंह मेवाड़ ने भास्कर को बताया कि फिल्म देखने के बाद मेरे साथ सभी तीनों सदस्यों ने फिल्म को रिलीज नहीं करने की सिफारिश की, लेकिन बोर्ड ने फिल्म का नाम बदलकर और कुछ कट लगाकर खुद ही रिलीज करने का फैसला ले लिया।
- मेवाड़ ने बताया कि फिल्म ऐसी है कि नाम बदलने के बाद भी हिंदू-मुस्लिमों में झगड़ा-फसाद होने की संभावना है।
- रिव्यू कमेटी में मेवाड़ राजघराने के अरविंद सिंह मेवाड़, इग्नू विवि दिल्ली के प्रो. केके सिंह और जयपुर से चंद्रमणि सिंह शामिल थे।
- बताया जा रहा है कि असहमति के बाद भी फिल्म को रिलीज करने के निर्णय में मुख्य भूमिका सीबीएफसी चेयरमैन प्रसून जोशी की रही।
- अरविंद सिंह ने बताया कि फिल्म में राजपूतों का ही अनादर नहीं, बल्कि मुस्लिमों का भी अनादर दिखाया गया है।

जायसी के पद्मावत पर फिल्म, तो नाम पद्मावत
- फिल्म का नाम पद्मावती से पद्मावत करने के पीछे काल्पनिक काव्य पद्मावत वजह मानी जा रहा है।
- जायसी के काल्पनिक पद्मावत के आधार पर फिल्म बनाई गई है, इसलिए इसका नाम बदला गया, मगर मेवाड़ ने जायसी के पद्मावत को भी यह कहकर नकारा कि मलिक मोहम्मद जायसी ने पद्मावत को 1540 में लिखा था। जबकि पद्मावती के जौहर से जुड़ी घटना 1303 की है।

मेवाड़ के माहौल को न बिगाड़ें : मुफ्ती ब्रदे आलम
जिन बातों से समाज में वैमनस्य फैले, उस पर पाबंदी होनी ही चाहिए। मेवाड़ का माहौल सौहार्दपूर्ण रहा है। जो हर हाल में कायम रहे। आवाम की तरक्की के लिए अमन-चैन और भाईचारा जरूरी है।
बद्रे आलम साहब, मौलाना-मुफ्ती अंजुमन
तालिमुल इस्लाम उदयपुर

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