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पैडमैन का गांव देखा है ! यहां लड़के सैनेटरी पैड्स बनाते हैं

जहां लोग इस मुद्दे पर बात नहीं करना चाहते, वहीं ये युवा इस खामोशी को तोड़ने का काम कर रहे हैं।

अर्बुदा पंड्या | Last Modified - Dec 31, 2017, 01:28 AM IST

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    जयपुर. राजसमंद का एक छोटा सा कस्बा रेलमगरा बमुश्किल 18 किलोमीटर में बसा है। कोई साढ़े आठ हजार की आबादी। यहां एक छोटी सी वर्कशॉप में इस गांव के युवा अपनी पत्नी, बहन, मां, परिचित लड़कियों के लिए सैनिटरी नैपकिन बनाने का काम कर रहे हैं। जहां लोग इस मुद्दे पर बात नहीं करना चाहते, वहीं ये युवा इस खामोशी को तोड़ने का काम कर रहे हैं।

    - दरअसल उदयपुर की एक गैर सरकारी संस्था ‘जतन’ गांव के इन दो हजार युवाओं को सैनेटरी पैड बनाने और इसकी अहमियत समझने में मदद कर रही है। गांव में पीरियड्स पर बात करना कोई प्रतिबंधित विषय नहीं रहा। बल्कि यहां हर किराने की दुकान पर युवा लड़कों द्वारा तैयार किए रीयूजेबल सैनेटरी पैड्स बिकते हैं। इतना ही नहीं, पैड्स को पैक करने के लिए कागज या काली थैली का इस्तेमाल भी नहीं किया जाता।

    - असल में जतन रीयूजेबल इको फ्रेंडली सूती कपड़े के पैड पर काम कर रही थी। सह-संस्थापक लक्ष्मी मूर्ति ने महसूस किया कि जब उनके पैड गांव में दुकानों पर बेचे जाने लगे तो लड़कियां पुरुषों से पैड खरीदने में झिझकती थीं तो उन्होंने गांव के युवाओं को ही अपने इस प्रोजेक्ट के साथ जोड़ लिया। वे उन्होंने नैपकिन डिजाइन का तरीका सिखानी लगीं।

    - लक्ष्मी बताती हैं, शुरू में लड़कों को इसके लिए तैयार करना मुश्किल था। गांव वालों से तानें भी सुनें, लेकिन उन्होंने लड़कों की काउंसलिंग जारी रखी। अाज यहां हर साल 500 से ज्यादा युवाओं को यहां पैड डिजाइनिंग का प्रशिक्षण दिया जाता है।

    देखिए...जो देश की हर महिला के साथ होता है, वैसा यहां नहीं होता
    - जल्द ही अक्षय कुमार की ‘पैडमैन’ फिल्म आने वाली है। फिल्म महिलाओं के सबसे बड़े दर्द पर है। फिल्म में जो किरदार अक्षय निभा रहे हैं...वह काम ये युवा रोज करते हैं।

    - ये सैनेटरी पैड्स बना रहे हैं। इन्हीं की बदौलत राजसमंद के इस छोटे से कस्बे रेलमगरा में वह नहीं होता जो देश की हर महिला के साथ होता है। जब भी कोई महिला सैनेटरी पैड्स खरीदने जाती है...तो दुकानदार पैड को पुराने अखबार में लपेटकर काली थैली समेत हाथ में थमा देता है, जैसे यह कुछ आपत्तिजनक हो। यहां ऐसा नहीं है। यहां इस विषय पर खुलकर बात होती है।

    पहले दिन मां से थप्पड़...अब परिवार का सहयोग

    जब मैंने पहली बार यह काम सीखा और इस मुद्दे को समझने की कोशिश तो घर जाते ही मां ने थप्पड़ मार दिया। भारी विरोध के बावजूद मैंने डिजाइनिंग करना नहीं छोड़ा। लेकिन आज मेरा पूरा परिवार मेरा सहयोग करता है।
    - ओमप्रकाश, प्रोजेक्ट मैनेजर, जतन

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