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अब पीएम हाउस में सजेगी पिछवाई पेंटिंग, 350 साल पुरानी है ये कला

सीएम राजे ने पीएम नरेंद्र मोदी को भेंट की पेंटिंग, मोदी ने पेंटिंग की तारीफ की

Dainik Bhaskar

Jan 09, 2018, 06:35 AM IST
cm vasundhara raje gave pichwai paintings gift to Prime Minister

उदयपुर. देश-दुनिया में विख्यात नाथद्वारा की पिछवाई कला की पेंटिंग अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास में भी सजेगी। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने हाल ही में दिल्ली में नरेंद्र मोदी से मुलाकात के दौरान यह पेंटिंग भेंट की। मोदी ने इसकी काफी तारीफ भी की। गौरतलब है कि यह कला साढ़े तीन सौ साल पुराने उस दौर की है जब श्रीनाथ प्रभु पहली बार मथुरा के जतीपुरा गांव से मेवाड़ पधारे थे। प्रभु के साथ ही वहां के 5 गौड़ ब्राह्मण परिवार भी मेवाड़ आए। इन्हीं पांच परिवारों ने पिछवाई आर्ट से मेवाड़ और नाथद्वारा को देश-विदेश में कला के क्षेत्र में नई पहचान दिलाई।


अलग-अलग सब्जेक्ट पर बनाई जाती है पिछवाई

- ब्रज से नाथद्वारा आए परिवारों की 14वीं पीढ़ी के पीयूष शर्मा ने बताया कि पिछवाई ठाकुर जी के अलग-अलग भाव और लीलाओं पर बनाई जाती है। इनमें शरद, हाेली, रासलीला, कुंज एकादशी, इंद्रमानभंग, प्रमोदिनी, जन्माष्टमी प्रमुख है।

- इसके अलावा प्रभु को साल के 365 दिन अलग-अलग पिछवाई भी धराई जाती है।

- श्रीनाथ प्रभु के अलावा इनके सातों स्वरूपों में कोटा के मथुराधीश, नाथद्वारा के विट्ठलनाथजी, कांकरोली के द्वारकाधीश, सूरत के बालकृष्ण लाल जी की हवेली, कामवन में मदन मोहनजी, कामनवन के नटवर गोपालजी, गोकुल के गोकुल चंद्रमा जी को धराने के लिए पिछवाई नाथद्वारा से ही भेजी जाती है।

- पिछवाई आर्ट की पेंटिंग को तैयार होने में दो महीने से लेकर सालभर तक लग सकता है। ये समय इसके सब्जेक्ट और साइज पर आधारित है।

- बनने के बाद इसकी कीमत 50 हजार से लेकर 7 लाख तक जा सकती है।

#ऐसे बनती है पिछवाई पेंटिंग

कपड़ा : पिछवाई बनाने के लिए सफेद रंग का कैमरी नाम का विशिष्ट कपड़ा उपयोग में लिया जाता है। पेंटिंग की साइज के हिसाब से इसे काटकर इसके ऊपर और नीचे नेफा लगाया जाता है। फिर उस पर ब्रश से पेंटिंग उकेरी जाती है।
रंग : पुराने समय में पिछवाई बनाने के लिए वेजीटेरियन रंग उपयोग होते थे। इन रंगों की जगह अब कलकत्ता के लक्ष्मी पेंट ने ले ली है। इसके अलावा सोने और चांदी के वर्क के लिए दोनों पदार्थ को पीसकर उनकी स्याही बनाई जाती है। फिर इनको ब्रश या छपाई के जरिए पिछवाई पर चढ़ाया जाता है।
ब्रश : पेंटिंग में काम आने वाला ब्रश गिलहरी की पूंछ के बालों से बनाया जाता है। इसके लिए सबसे पहले कबूतर के पंख की पिच में बाल फंसाए जाते हैं। फिर इसे उपयोग किया जाता है। पीयूष शर्मा ने बताया कि ये दुनिया का सबसे बारीक ब्रश है। ये नाथद्वारा के अलावा दुनिया में ना तो मिलता है और ना ही बनता है।
घुटाई : पिछवाई के कपड़े पर कलर के बाद इसकी हकी नाम के पत्थर के साथ घुटाई की जाती है। जानकार बताते हैं कि एक बार अगर सही से रंग चढ़ जाए तो वो 150 सौ से 200 साल तक फीका नहीं पड़ता। पुष्टिमार्गीय मंदिरों और हवेलियों में आज भी 300 साल से ज्यादा पुरानी पिछवाइयां मौजूद है।

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