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भास्कर टीम ने की दिल्ली और राजस्थान के सरकारी स्कूलों की तुलना

सरकारी स्कूलों में जिम, स्वीमिंग पूल, कैमरे और मेड!

Bhaskar News | Last Modified - Feb 12, 2018, 05:21 AM IST

भास्कर टीम ने की दिल्ली और राजस्थान के सरकारी स्कूलों की तुलना

नई दिल्ली,उदयपुर. (भास्कर की ग्राउंड रिपोर्ट). चमकदार भव्य ग्रेनाइट पत्थरों की भव्य इमारत देख अंदाजा लगाना मुश्किल था कि हम किसी सरकारी स्कूल में पहुंचे हैं, अंदर साफ-सुथरे गलियारे और परिसर देख आप भी चौक जाते हैं लेकिन ठहरिये। आपकाे और भी कई बातें चौकाने वाली है। ये हैं दिल्ली के सरकारी स्कूल। जहां स्वीमिंग पूल से लेकर बच्चों के लिए जिम है। स्मार्ट क्लासरूम, जिसमें ऑडियो-विजुअल से पढ़ाई होती है। बच्चों के लिए बैंच-मेज कुर्सी निजी स्कूलों से भी कई बढ़कर हैं। सीसीटीवी की जद में स्कूल और गेट पर सुरक्षा गार्ड का पहरा है। दूसरी तरफ राजस्थान के सरकारी स्कूल की स्थिति की तुलना करें तो यहां जर्जर और दरकते भवन हैं। कई स्कूलों में भवन और टॉयलेट तक नहीं है। हजारों स्कूल एक शिक्षक के भरोसे संचालित हैं।


जानिए कैसे हैं दिल्ली के सरकारी स्कूल

दिल्ली के दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर संचालित सर्वोदय राजकीय सी.सै. स्कूल में जब हम पहुंचे तो गेट पर वर्दी में तैनात महिला सुरक्षा गार्ड ने हमें रोककर कारण पूछा। फिर रजिस्टर में एंट्री के बाद जब स्कूल के अंदर पहुंचे तो स्कूल बिल्डिंग देखकर एकबारगी विश्वास नहीं हुआ कि हम किसी सरकारी स्कूल में खड़े हैं। कुछ बच्चे खिलौने जैसे आकार की ढपली-ढोलक बजा रहे थे। शिक्षा के साथ इन्हें गीत-संगीत का माहौल दिया जाता है।


यहां स्कूल में मेड रखती है नन्हें बच्चों का ख्याल

नन्हें बच्चों की कक्षा में महिला मेड टॉयलेट कराने से लेकर खाना खिलाने तक का पूरा ख्याल रखती हैं। फिजिकल ट्रेनर की निगरानी में बच्चे जिम कर रहे थे। मिस्टर इंडिया, यूनिवर्सिटी चैम्पियन और मिस्टर दिल्ली तक बन चुके हैं। स्कूल प्रिंसिपल डॉ. देवेन्द्र ने बताया कि दो साल में स्कूल पर 10 करोड़ खर्च हुए हैं। इस सत्र में यहां कुल 1250 में से 300 नए एडमिशन हुए। इनमें 58 छात्र निजी स्कूल से टीसी कटाकर अाए। दिल्ली का रोहणी पश्चिम स्थित सरकारी स्कूल पहंुचे।

यहां के प्रिंसिपल अरुण भाटिया ने बताया कि 3500 नामांकन और 125 टीचिंग स्टाफ है। पास के केंद्रीय विद्यालय से शिक्षकों की कमी के बेहतर उपयोग को लेकर टाइअप किया हुआ है। दिल्ली के ही मयूर विहार स्थित सर्वोदय कन्या विद्यालय में ढाई करोड़ की लागत से स्वीमिंग पूल, क्रिकेट नेट अभ्यास पिच और 17 कक्षा कक्ष बनाए गए हैं। छात्राओं की सुरक्षा के लिए 16 सीसीटीवी कैमरे से निगरानी होती है।

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पढ़ाई : कमजोर व सामान्य बच्चों को बढ़ाने के लिए है खास पहल
एक कक्षा ऐसी है जिसमें प्रतिभा, निष्ठा, नियो श्रेणी के बच्चे साथ पढ़ते हैं। प्रतिभा यानी पढ़ने-समझने वाले, निष्ठा श्रेणी में देर से समझने वाले और नियो श्रेणी में पढ़-लिख नहीं पाने वाले। दो साल में दसवीं का 100% और 12वीं का 93% रहा है।

सुरक्षा : स्कूलों में 24 घंटे पुरुष महिला गार्ड, कैमरे... नर्सरी में मैड
स्कूल में 24 घंटे महिला-पुरुष सुरक्षा गार्ड। नर्सरी कक्षा में महिला मैड। कक्षा और परिसर में सीसीटीवी कैमरों से निगरानी।

सुविधा : स्मार्ट क्लास रूम...एसी हॉल, लाइब्रेरी पर जाेर
स्वीमिंग पूल, जिम, एसी मल्टी पर्पज हॉल, बैंच और मेज-कुर्सी, ऑडियो-विजुअल स्मार्ट रूम, बच्चों के अखबार-मैगजीन पढ़ने और खेल की सुविधा।

स्तर : यहां दाखिले के लिए लाइन...सिफारिश फोन आते हैं
दिल्ली सरकार के कुल 1029 स्कूल हैं इनमें करीब 200 स्कूलों में दो हजार से ज्यादा नामांकन हैं यहां दाखिले के लिए प्रिंसिपल के पास मंत्री तक के फोन आते हैं। प्रिंसिपल का भार कम करने के लिए प्रत्येक स्कूल में आर्मी से रिटायर्ड व्यक्ति को स्टेट मैनेजर के रूप में नियुक्ति दी गई है।

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पढ़ाई : कई योजनाएं, डीईओ को बैंगलुरू ट्रेनिंग पर भेजा, असर नहीं
शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए सीसीई, एसआईक्यूई सहित कई योजनाएं हैं, फिर भी स्तर नहीं सुधर रहा। कमजोर बच्चों के लिए अलग से पाठ्यक्रम भी तैयार किया गया। डीईओ को बैंगलुरू में लीडरशिप ट्रेनिंग भी दिलाई गई पर खास प्रभाव नहीं दिखा।

सुरक्षा : बच्चे के साथ स्कूल का सामान तक सुरक्षित नहीं रहता है
हमारे सरकारी स्कूलों में सुरक्षा का स्तर सबसे गिरा हुआ है। सीसीटीवी कैमरे तो भूल ही जाइए...गार्ड और मैड तक नहीं हैं।

सुविधा : भवन तक अपने नहीं हैं...अधिक किराए पर या खुले में
राज्य में मॉडल स्कूलों को छोड़ दे तों ज्यादातर स्कूल भवन जर्जर हैं, कोई किराए पर तो कई खुले में चल रहे हैं। कई में लम्बे समय से रंग-रोगन तक नहीं हुआ।

स्तर : हर साल प्रवेशोत्सव मनाते हैं...फिर भी ड्रॉपआउट बढ़ रहा
बच्चों को लेपटॉप, साइकिल, स्कूटी वितरण और मेधावी छात्राओं को प्रोत्साहन राशि प्रदान करने की योजनाएं तो हैं, लेकिन उनका असर नहीं दिख रहा। सतत शिक्षा मूल्यांकन और एसआईक्यू जैसे प्राेजेक्ट में भी नहीं मिल रहा परिणाम।

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