उदयपुर

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तलाक करवाया, फिजिकल रिलेशन बनाए, दो बार अबॉर्शन फिर शादी से इनकार

शादी करने का वादा कर पीड़िता से कई बार दुष्कर्म किया

Danik Bhaskar

Jan 26, 2018, 04:56 AM IST

उदयपुर. राजस्थान पुलिस की महिला कांस्टेबल से दुष्कर्म करने के दोषी महाराणा प्रताप कृषि एवं अभियांत्रिकी विश्व विद्यालय के पूर्व सहायक प्रोफेसर महेंद्र सिंह सेवदा को महिला उत्पीड़न मामलों के एडीजे डॉ. दुष्यंत दत्त ने गुरुवार को 10 वर्ष कड़ी कैद की सजा सुनाई। महेंद्र सिंह फिलहाल कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग रानी पुल, गंगटोक में प्रोफेसर है। जब मामला दर्ज हुआ था तब वे सीटीएई कॉलेज के फार्म मशीनरी एंड पावर इंजीनियरिंग विभाग में सहायक प्रोफेसर थे।

रिपोर्ट में बताया गया था कि 2004 में सेवदा ने प्रार्थिया से जयपुर में दोस्ती की। इसके बाद वह उसे घुमाने के लिए उदयपुर लाया व सरकारी क्वार्टर में पीड़िता को नशीला पदार्थ पिला दिया। सुबह होश में आने पर महिला कांस्टेबल काे दुष्कर्म का पता चला था।

इसके बाद अभियुक्त ने शादी करने का वादा कर पीड़िता से कई बार दुष्कर्म किया। इस बीच अभियुक्त ने दो बार पीड़िता का गर्भपात भी करवाया। पीड़िता का बाल विवाह भी हुआ था। ऐसे में अभियुक्त ने पीड़िता का तलाक भी करवा दिया। बाद में महिला ने शादी के लिए पूछा तो अभियुक्त ने इनकार कर दिया।

महिला कांस्टेबल जयपुर की है, धोखाधड़ी में भी चार साल की सजा

अदालत ने अभियुक्त महेंद्र सिंह को धारा 376 के अंतर्गत 10 वर्ष की कड़ी कैद और 50 हजार रुपए जुर्माना और धारा 420 के तहत 4 वर्ष कैद व 10 हजार रुपए जुर्माना की सजाएं सुनाई।

मामले के अनुसार जयपुर में कार्यरत एक महिला कांस्टेबल ने 18 जनवरी 2007 को प्रो. महेंद्र सिंह सेवदा के खिलाफ दुष्कर्म की शिकायत तत्कालीन एसपी को गोपनीय पत्र लिखकर की थी। एसपी के आदेश पर महिला थाने में रिपोर्ट धारा 376, 420 के अंतर्गत दर्ज की गई थी।

यह काम प्रोफेसर ने किया, कड़ी सजा न मिली तो अन्याय होगा : कोर्ट

महिला उत्पीड़न मामलों के एडीजे डॉ. दुष्यंत दत्त ने फैसले में टिप्पणी की कि अभियुक्त कोई अल्प शिक्षित या कमजोर मस्तिष्क का व्यक्ति नहीं बल्कि एक उच्च शिक्षित प्रोफेसर है। उससे दुष्कर्म जैसे घृणित अपराध की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

अदालत ने लिखा कि अगर अनुसंधान में बरती गई कुछ कमियों को अाधार मान कर अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया जाए ताे यह पीड़िता के प्रति न्याय नहीं होगा। इसलिए तकनीकी खामियां देखने के बजाय न्यायालय की जिम्मेदारी है कि सारवान रूप से न्याय हाे।

विधि का यह सुस्थापित सिद्धांत है कि जब तक विरोधाभास या विसंगति आधारभूत रूप से अभियोजन कहानी पर प्रहार नहीं करती हो तब तक मात्र कुछ कमियों के कारण उसे संदेहास्पद नहीं माना जा सकता है। वर्तमान में दुष्कर्म की घटनाओं में दिनों दिन वृद्धि हो रही है। दाेषी को अपराध का उचित दंड दिया जाना आवश्यक है ताकि दुष्कर्म की मानसिकता के लोगों में कानून का भय पैदा हो।

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