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मंडे पॉजिटिव: 90 पैसे में सेनेटरी नेपकिन बनाने वाली मशीन ईजाद की

पैड में डालते हैं बीज...ताकि निस्तारण के बाद उग जाएं पौधे

Danik Bhaskar | Jan 22, 2018, 06:54 AM IST

उदयपुर. शहर के युवा इंजीनियर भाई 25 वर्षीय अब्दुल कादिर और 22 वर्षीय अब्दुल अलीम खान ने पहले सिर्फ 90 पैसे में सेनेटरी नेपकिन पैड बनाने की मशीन ईजाद की। अब बायो डिग्री डेबल स्टार्च वेस्ड प्लास्टिक के ऐसे पैड बना रहे हैं, जिनके इस्तेमाल के बाद जमीन में गाड़ने के 45 दिन बाद पैड की जगह पेड़ उग आते हैं।

- खान बताते हैं कि वे करीब डेढ़ वर्ष की रिसर्च के बाद पैड के पिछले हिस्से में इस्तेमाल होने वाली प्लास्टिक की जगह अब बाॅयो डिग्री डेबल स्टार्च वेस्ड प्लास्टिक के पैड बना रहे हैं।

- इस प्लास्टिक से बने पैड को जमीन में गाड़ देने के 45 दिन के भीतर जीवाणु निस्तारित कर देते हैं। पैड में पहले से ही रखे बीजों से पेड़ आते हैं।

- हालांकि कादिर और अलीम का कहना है कि बायो डिग्री डेबल स्टार्च वेस्ड प्लास्टिक से बने नैपकिन की कीमत फिलहाल 3 रुपए आ रही है, जिसे वे रु. 1.5 रु तक लाने में लगे हैं।

- वे यह मुहिम अपनी मां शहनाज की प्रेरणा से चला रहे हैं। इनकी बनाई मशीन का नाम भी शहनाज है। कादिर शहर की एक कंपनी में 32 हजार रुपए प्रतिमाह की तनख्वाह पर जॉब भी करते हैं।

पोली-इथाइलीन प्लास्टिक के पैड का नहीं हो पाता निस्तारण

फिलहाल अमूमन नैपकिन पैड के पिछले हिस्से में पोलीइथाइलीन प्लास्टिक का इस्तेमाल किया जाता है, जिनको कचरे के साथ डंप करने पर निस्तारण नहीं हो पाता है। जो पर्यावरण के लिए सिरदर्द साबित हो रहा था।

इनकी मशीनें उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश में हो रही कारगर

उन्होंने बताया कि उत्तराखंड सरकार ने हाल ही में इनकी बनाई मशीन सेट रुद्रपुर में स्थापित की है, जिनसे वहां 10 तरह के सेनेटरी नैपकिन बनाए जा रहे हैं। कोलकाता सरकार ने चंद्रकोना और डेबरामिदनीपुर में दो-दो मशीनों का सेट लगाया है, मध्यप्रदेश सरकार ने आजीविका मिशन के तहत मनवाड़ा और खजूरी में दो मशीनों का सेट लगाया है। सभी जगह प्रति पैड उत्पाद लागत 90 पैसे से 1 रुपए आ रही है। 1 मशीन 8 घंटे में 1000-1200 पैड बना देती है।

रिसर्च के दौरान दोस्त उड़ाते थे मजाक
अब्दुल कादिर और अलीम ने बताया कि जब 18 माह पहले पैड में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक के निस्तारण की खोजबीन की तो दोस्त मजाक उड़ाते थे। लेकिन, यह ठान रखी थी कि कचरों के ढेर में एकत्रित होने वाले पैड्स के प्लास्टिक से पर्यावरण को बचाना ही है। रिसर्च का रिजल्ट जब सकारात्मक आया तो सब चौंक गए।