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गर्मी में बढ़ जाते हैं मारपीट और हत्याओं के मामले, ज्यादा सुरक्षित हैं हेमंत और शिशिर

ऋतुओं का अपराधियों की मन:स्थिति और सक्रियता पर भी पड़ता है असर

Dainik Bhaskar

Mar 04, 2018, 07:37 AM IST
Seasons also affect the mentality of criminals

उदयपुर. क्या ऋतुओं का अपराधों से कोई वास्ता हैω जी हां। छह ऋतुओं और अपराधों के बीच एक रिश्ता है। आंकड़ाें का विश्लेषण करने और पुलिस के पुराने अधिकारियों से बातचीत करने पर यह रोचक तथ्य सामने आता है। गर्मी के दिनों में जहां आपसी झगड़ों, मारपीट, पारिवारिक कलह और हत्याओं तक के मामले सबसे ज्यादा हाेते हैं, वहीं आत्महत्या के केस भी अपेक्षाकृत ज्यादा सामने आते हैं।

शिशिर ऋतु में अपराध कम होते हैं, जबकि वसंत में तो अपराधों की संख्या और भी कम हो जाती है। साल 2017 में हत्याओं के सबसे ज्यादा मामले ग्रीष्म ऋतु (मई-जून) में सामने आए। उस समय 280 घटनाएं दर्ज हुईं। 2016 और 2015 की ग्रीष्म में भी कमोबेश यही आंकड़े रहे। हेमंत (नंवबर-दिसंबर) और शिशिर (जनवरी-फरवरी) में यही अपराध काफी कम दर्ज हुए।

एक रोचक तथ्य यह भी सामने आया कि हेमंत और शिशिर के दौरान अपराध तो कम हुए, लेकिन उनकी नृशंसता काफी बढ़ गई। अलबत्ता, इन ऋतुओं के दौरान परिधान और घरों में रहने के तौरतरीकों के बदलाव के चलते अपराधों पर भी फर्क सामने आात है। ये ऋतुएं ऐसी हैं, जब लोग घरों में दरवाजे और खिड़कियां ठीक से बंद करके सोते हैं और सुरक्षा का भी ध्यान रखते हैं।

इसके अलावा जिन दिनों में वार-त्योहार होते हैं या जिन दिनों में लोग धार्मिक या सामाजिक पर्यटन पर रहते हैं, उन दिनों में चोर उचक्के अक्सर सक्रिय हो जाते हैं और घरों में संेध लगा देते हैं। ग्रीष्म के सन्नाटों में आम आदमी तो दिन में सोया रहता है और घर दफ्तर खुले रहते हैं। कूलर का शोर भी रहता है।

वर्षा : तीन साल पहले 2015 में हुए थे सबसे ज्यादा अपराध
2015 में अन्य ऋतुओं की तुलना में वर्षा ऋतु में सर्वाधिक 721 मामले, 2017 में सर्वाधिक 639 दर्ज किए गए। हत्या और जानलेवा हमले की घटना ग्रीष्म ऋतु में ज्यादा हुईं। 2017 में हत्या के ग्रीष्म ऋतु 280, 2016 में 300 और 2015 में 315 मामले दर्ज हुए। ये मामले इन वर्षों में अन्य ऋतुओं की तुलना में सर्वाधिक पाए गए। मौसम का चोरी की घटनाओं पर भी बड़ा असर देखा गया है।

ग्रीष्म : लोग ज्यादा देर तक बाहर रहते हैं और जल्दी उत्तेजित हो जाते हैं
मनोवैज्ञानिक डॉ. तमन्ना ने बताया कि गर्मियों में दिन बड़े और रातें छोटी होती हैं। लोग ज्यादा देर घर से बाहर रहते हैं। मिलना-जुलना ज्यादा रहता है। इससे विवाद भी ज्यादा होते हैं। मनोवैज्ञानिक डॉ. वर्षा शर्मा बताती हैं, गर्मियों में लोग जल्दी उत्तेजित हो जाते हैं। यह मनोवृत्ति आपराधिकता में भी बदल सकती है। सेवानिवृत एएसपी निरंजन आल्हा कहते हैं, घरों में चोरी-नकबजनी, महिलाओं के साथ होने वाली चेन स्नेचिंग जैसे अपराध मौसम के साथ बदलती आपराधिक परिस्थितियों पर भी निर्भर करते हैं। हालांकि एक ऋतु के पहले और बाद की ऋतु के कुछ दिन भी उसी अनुसार मानवीय व्यवहार को प्रभावित करते हैं।

शरद : सर्दी के दिनों में अपेक्षाकृत कम होती चेन झपटने की घटनाएं
पुलिस के अनुसार चेन स्नेचिंग पर भी ऋतुओं का सीधा असर दिखा है। 2016 और 2017 में उदयपुर में क्रमश: 12 और 28 ऐसी वारदातें हुईं। 2014 और 2015 के आंकड़े भी इसकी तस्दीक करते हैं। इनमें एक भी घटना दिसंबर और जनवरी में नहीं हुई। वहीं 2017 के ग्रीष्म ऋतु में सर्वाधिक 13 चेन स्नेचिंग हुई, जबकि 2016 में शरद में 6 वारदातें हुई। राजस्थान में 2017 जनवरी से सितंबर तक 293 चेन स्नेचिंग हुई थी।

मनोवैज्ञानिक : हमारे मन को प्रभावित करते हैं मौसम और इसी से मनोवृत्ति भी बदलती है

वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक शिव गौतम बताते हैं, मौसम मनुष्य मन को प्रभावित करते हैं और इसके अनुरूप मानवीय व्यवहार या मनोवृत्ति बदलती है। हालांकि इस विषय पर कोई शोध नहीं हुआ है, लेकिन इसकी जरूरत है और यह एक अच्छा विषय भी है। जैसे फागुन-सावन में मन उल्लासपूर्ण होता है, जिसका हवाला हमारे काव्य शास्त्र में भी मिलता है। यह उल्लास कभी-कभी नकारात्मक होने पर महिलाओं के साथ होने वाली अप्रिय घटनाओं में तब्दील हो जाता है। गर्मियों में व्यक्ति के मन में उत्तेजना ज्यादा होती है। गर्मियों में उत्तेजना से पीड़ित पेशेंट भी बढ़ जाते हैं। उत्तेजना से संबंधित अपराध जैसे झगड़े, मारपीट या हत्याएं बढ़ जाते हैं। ज्योतिष में भी इस बात का हवाला है कि ऋतुएं मानवीय मन को प्रभावित करते हैं। जैसे अमावस की रात या पूर्णिमा की रात मानवीय मन को अलग-अलग तरह से प्रभावित करते हैं, हालां कि ज्योतिष और मनोविज्ञान में इस संबंध पर भी शोध होने की जरूरत है।

पुलिस : छुटि्टयाें में सूने मकान होते हैं सॉफ्ट टारगेट

यह सही है कि मौसम के अनुसार आपराधिक परिस्थितियां बदलती हैंं। सर्दियों में लोग विंटर वैकेशन और गर्मियों में समर वैकेशन पर जाते हैं, घर पर कोई नहीं होता तो चोरियां बढ़ती हैं।
{ज्यादा गर्मियों में कूलर-एसी चलाकर पूरा परिवार एक कमरे में या छत पर सोता है, बाकी कमरों में कोई नहीं होता है। इससे रात में हुए चोरी जैसी गतिविधियों का भी पता नहीं चल पाता है। बहुत ज्यादा सर्दियों में भी लोग घरों में रजाई में बिलकुल पैक होकर सोते हैं और पड़ोस की गतिविधियों का अंदाजा नहीं लगता।
{सर्दियों में महिलाएं शॉल-स्वेटर पहनती हैं, ऐसे में जब चेन नजर ही नहीं आएगी तो चेन स्नैचिंग कैसे होगी। वहीं गर्मियों में महिलाओं की चेन आसानी से नजर आ जाती है, साथ ही वे सुबह-सुबह मंदिर जाती है, इस समय गलियों में ज्यादा भीड़-भाड़ नहीं होती, इससे चेन स्नैचर्स को भागने में आसानी होती है।
{मौसम साइकोलॉजी के तहत बरसात के जिन दिनों में लगातार बादल रहते हैं और कई दिनों तक सूरज नहीं निकलता है, इन दिनों अवसाद बढ़ने से सुसाइडल टेंडेंसी बढ़ती है।

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