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उमर जो वादा अधूरा छोड़ तुम दुनिया के रंगमंच से चले गए थे, उसे तुम्हारे बेटे यूसुफ ने पूरा किया

जो भपंग को जानता है वो उमर फारुख को कैसे भूल सकता है...आज उसकी याद में शिल्पग्राम का मंच नम

सर्वेश शर्मा | Last Modified - Dec 27, 2017, 03:56 AM IST

  • उमर जो वादा अधूरा छोड़ तुम दुनिया के रंगमंच से चले गए थे, उसे तुम्हारे बेटे यूसुफ ने पूरा किया
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    आज...26 दिसंबर 2017: प्रस्तुति देता यूसुफ (बीच में)। फोटो : राहुल सोनी

    उदयपुर. उमर फारुख मेवाती,...तीस साल में यह पहला मौका है जब तुम शिल्पग्राम के इस रंगमंच पर अपनी भपंग के साथ मदमस्त धुनें छेड़ने नहीं आए हो। यकीन करने का मन ही नहीं हो रहा है कि तुम दुनिया के रंगमंच से पिछले दिनों सदा-सदा के लिए विदा हो चुके हो। सच कह रहा हूं उमर, तुम्हारे यूं चले जाने से शिल्पग्राम का चप्पा-चप्पा गमज़दा है। वो दर्शक दीर्घा तुम्हे पुकार रही है, जहां तुम अपनी मंडली के साथ अभ्यास में यूं लीन थे मानो कोई तपस्वी आराधना में लीन हो। हिंदी सिनेमा के परदे से लेकर दुनिया के 37 देशों में अपनी लोक कला से श्रोताओं को विभोर कर चुके अलवर में जन्मे उमर ने पिछले साल ही मुझे दिए एक इंटरव्यू में पक्का वादा किया था कि वे अगले साल शिल्पग्राम में गोवा, महाराष्ट्र और गुजरात की लोकधुनों के साथ ऐसा फ्यूजन करेंगे कि श्रोता सुनते ही रह जाएंगे। वे इसकी तैयारी भी कर रहे थे। उन्होंने मुझे इसके कुछ अंश भी सुनाए थे।

    मंच पर सब कुछ वैसा ही था, जैसा तुम्हारे वक्त होता था... बस, एक तुम्हारे सिवा

    मर तुम्हे पता है, जब तुम्हारा अधूरा वादा पूरा करने के लिए तुम्हारा बेटा यूसुफ खां भपंग लेकर मंगलवार को तुम्हारी जगह खड़ा हुआ तो शिल्पग्राम के मंच से लेकर दर्शक दीर्घा तक हर उस शख्स की आंखें नम हो गईं, जिसने तुम्हारी भपंग सुनी थी। मंच पर जाने से पहले यूसुफ पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र के निदेशक फुरकान खान के गले लगकर तुम्हारी याद में भावुक हो गया। जब यूसुफ मंच पर आया तो सबकुछ वैसा ही था, जैसा तुम्हारे वक्त होता था... बस, एक तुम्हारे सिवा। उसके दाएं-बाएं वे ही सहायक कलाकार थे, जो तुम्हारे साथ होते थे। भपंग वो बजा रहा था लेकिन उसके सुरों में विरासत बनकर तुम बह रहे थे। उमर अब मैं तुम्हे कैसे बताऊं कि मुझे ही क्या, हर किसी दर्शक को वहां युसुफ में तुम ही नजर आ रहे थे। यूसुफ कह भी रहा था कि इस रंगमंच पर मैं तीसरी पीढ़ी हूं। पहले अब्बा हुजूर के साथ आता था, अब....। कहते-कहते उसके शब्द चुप हो गए और आंखें बहने लगी।

    यूसुफ ने संभाल ली है तुम्हारी विरासत

    उमर, तुमने ही तो मुझे बताया था कि यूसुफ सिविल इंजीनियर है और बड़ी कंपनी में अच्छी खासी नौकरी भी कर रहा है, लेकिन भपंग और उसके सधे हुए सुरों की विरासत तुम उसे सौंपना चाहते हो। पिछले साल भी यूसुफ तुम्हारे साथ लय और ताल की संगत बैठा रहा था। हां, मुझे याद आया, तुमने कहा था कि तुम भी सरकारी नौकरी में थे, लेकिन अपनी पुश्तैनी लोककला को जीवंत रखने को बड़ी जिम्मेदारी मानते हुए तुमने नौकरी छोड़ दी थी। उमर, तुम तो रिदम ऑफ मेवात संस्था के माध्यम से लुप्त हो रहे मेवाती लोक वाद्य तथा दोहा-धानी, रतवाई आदि गायन शैलियों के बीज अगली पीढ़ी में रोप रहे थे। उमर तुम्हे जानकर खुशी होगी कि जैसे तुमने अपने अब्बा हुजूर जहूर खां मेवाती की विरासत को संभाला था वैसे ही यूसुफ ने भी तुम्हारी विरासत बखूबी संभाल ली है।

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    तब...26 दिसंबर 2013: भपंग बजाते उमर फारूख (बीच में) पास में यूसुफ।
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Web Title: Stage Of Shilpgram Reporting In Udaipur
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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