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1957 में भीम राष्ट्रीय व्यायामशाला की स्थापना हुई, तब था क्रेज

झीलों की नगरी में भी हरियाणा की तरह कुश्ती का क्रेज हो, इसे लेकर पूर्व मुख्यमंत्री स्व. मोहनलाल सुखाड़िया ने एक सपना...

Danik Bhaskar | Apr 01, 2018, 06:50 AM IST
झीलों की नगरी में भी हरियाणा की तरह कुश्ती का क्रेज हो, इसे लेकर पूर्व मुख्यमंत्री स्व. मोहनलाल सुखाड़िया ने एक सपना देखा और उनके मार्गदर्शन में ही 1957 में पीछोला झील किनारे भीम राष्ट्रीय व्यायामशाला की स्थापना की गई। हालांकि अखाड़े को बनाने में सबसे ज्यादा योगदान अपने समय के जाने माने पहलवान उस्ताद कर्ण सिंह पहलवान ने दिया। दिन रात मेहनत की, युवाओं को कुश्ती के प्रति प्रोत्साहित किया, फिर तैयार होने लगे लेकसिटी के पहलवान। उस्ताद की ट्रेनिंग में शहर से कई नेशनल पहलवान तो तैयार हुए ही, वो शहर को 50 से अधिक शारीरिक शिक्षक भी दे गए। आज अखाड़े की हालत काफी दयनीय हो चुकी है। हालांकि अभी भी कई पहलवान पहलवानी के गुर सीखने हर शाम पसीना बहाने आते हैं। उनका यही कहना है कि जिला प्रशासन के साथ खेल अधिकारी इन पर ध्यान दें तो वे कुश्ती सीखने को काफी उत्सुक हैं और कुश्ती में देश के लिए खेलना चाहते हैं।

उस्ताद कर्ण सिंह ने ला दी थी कुश्ती की लहर कई नेशनल खिलाड़ी, प्रशिक्षक भी तैयार किए

झीलों के शहर में परंपरागत खेल कुश्ती और खत्म होते अखाड़ों को बचाने के लिए दैनिक भास्कर की शुरू की गई सीरीज के दूसरे अंक में चांदपोल स्थित उस्ताद कर्ण सिंह भीम राष्ट्रीय व्यायामशाला के बारे में जानिए कि कैसे तैयार हुआ यह अखाड़ा और कुश्ती के उत्थान में कितना योगदान रहा...

इस अखाड़े में पहलवानों का उत्साह बढ़ाने चार सीएम, कई अभिनेता आ चुके

2007 में उस्ताद कर्ण सिंह के निधन के बाद फिलहाल इस व्यायामशाला को उनके बेटे डॉ. दिलीपसिंह चौहान संभाल रहे हैं। वे बताते हैं कि सबसे पहले 1962 में उस्ताद कर्ण सिंह ने एक दंगल में जीत हासिल कर 11 हजार रुपए की ईनामी राशि हासिल की थी जिसे उस्ताद ने भारत-चीन युद्घ के समय सैनिकों की सहायता के लिए दान कर दी। उन्होंने अखाड़े को जिंदा रखने के साथ पहलवान तैयार करने के अंतिम सांस तक मेहनत करते रहे। 1982 में उस्ताद कर्ण सिंह ने एशियाड गेम्स दिल्ली में रेफरी की भूमिका भी निभाई।

यहां 2001 में महिला कुश्ती की शुरुआत हुई, शालिनी वर्मा स्टेट चैंपियन बनी थीं

पहलवानों का उत्साह बढ़ाने इस अखाड़े में पूर्व मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया, पूर्व सीएम शिवचरण माथुर, पूर्व सीएम हरदेव जोशी, पूर्व सीएम हीरालाल देवपुरा, अभिनेता फिरोज खान, धर्मेंद्र, पहलवान गुरु हनुमान, पद्म श्री चंगीराम, पद्म श्री सतपाल आ चुके हैं। अखाड़े में 2001 में महिला कुश्ती की शुरुआत हुई जिसमें शालिनी वर्मा राजस्थान चैंपियन बनीं। इसके बाद बड़ा मुकाबला नहीं हुआ है।

पूर्व सीएम मोहनलाल सुखाड़िया के नेतृत्व में भीम अखाड़े की शुरुआत हुई। एक मुकाबले के दौरान खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाने पहलवान दारा सिंह पहुंचे थे।

पूर्व सीएम ने बढ़ाया उत्साह तो कई पहलवान नेशनल लेवल पर खेले

इसी अखाड़े से तैयार सुशील सेन फिलहाल नेला गांव के बच्चों को जूडो व कुश्ती की ट्रेनिंग दे रहे हैं। खास बात यह है कि यहां से भी कई खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय स्तर पर परचम लहराया है। इसके अलावा एजाज मोहम्मद ने मेवाड़ किशोर दंगल, किशन सोनी ने मेवाड़ प्रताप दंगल, डॉ. दिलीप सिंह चौहान ने मेवाड़ बसंत दंगल जीता। यहां से तैयार राजेन्द्र सिंह राठौड़ फिलहाल राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभा दिखा रहे हैं।

इस अखाड़े में पहलवानी सीखने के लिए अभी भी शहर के कई लोग आते हैं लेकिन मार्गदर्शन नहीं मिलने के कारण उनकी रुचि घट रही है। खिलाड़ियों का कहना है कि उन्हें सिखाने वाला कोई यहां हो तो वे राज्य के लिए खेलकर मेडल भी जीत सकते हैं। उन्होंने अधिकारियों से अखाड़े में सुविधाएं बढ़ाने की मांग की है।