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रामायण करुणा और महाभारत समझाती है अन्याय का विरोध ही हमारी विरासत है : विजय बहादुर

विरासत किसी एक व्यक्ति की नहीं वह पौराणिक काल से चली आ रही सतत धारा है। मेरे समय की मेरी विरासत क्या है, इस पर भी...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 01, 2018, 07:05 AM IST

विरासत किसी एक व्यक्ति की नहीं वह पौराणिक काल से चली आ रही सतत धारा है। मेरे समय की मेरी विरासत क्या है, इस पर भी विचार होना चाहिए। रामायण और महाभारत हमारे महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं। रामायण से हम समझ सकते हैं कि करुणा ही हमारी विरासत है और महाभारत से यह जान सकते हैं अन्याय का विरोध ही हमारी विरासत है। समूचा अतीत हमारी विरासत नहीं हो सकता। विरासत केवल अतीत की पूजा से ही नहीं बनती और आधुनिक भी यदि केवल आयातित है तो वह केवल एक नकल । ये बता हिंदी के वरिष्ठ आलोचक प्रो. विजयबहादुर सिंह ने बुधवार को सुखाड़िया यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग और राजस्थान साहित्य अकादमी की राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘हिंदी की समकालीन रचनात्मकता और हमारी विरासत के समापन सत्र में व्यक्त किए।

समापन सत्र में हिंद के विभागाध्यक्ष प्रो. माधव हाड़ा ने कहा कि रचना कर्म सदैव परंपरा की भूमि पर होता है। उससे अलग जाकर रचना कर्म संभव नहीं है। इससे पूर्व व्याख्यान सत्र में बोलते हुए हिंदी के वरिष्ठ कवि हेमन्त शेष ने कहा कि साहित्य में अनेक संवेदनाओं और सरोकारों का निवास होता है। उसमें प्रत्येक प्रकार के यथार्थ और भावनाओं से बसने की जगह होती है। मनुष्य की अदम्य जिजीविषा का अमर गान ही साहित्य है और यह हमारे भीतर सहिष्णुता का भाव जगाता है।

वरिष्ठ कवि सवाई सिंह शेखावत ने कहा कि साहित्य समाज का दर्पण और मशाल दोनों होता है। परंपरा और समकालीनता दो पृथक-पृथक चीजें नहीं हैं, इन्हें एक कड़ी के रूप में देखा जाना चाहिए। वरिष्ठ आलोचक प्रो. कृष्ण कुमार शर्मा ने कहा कि कोई भी आधुनिक विचार विरासत से कटकर आगे नहीं बढ़ सकता। प्रो. मलय पानेरी ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य हमारे लिए धरोहर है। कथाकार की संवेदना ही आगे चलकर परम्परा बनती है। पुरातत्वविद जीवन सिंह खरकवाल ने इतिहास में मानव सभ्यता व विरासत को विविध तथ्यों के माध्यम से समझाया। उन्होंने जावर और दरीबा की खानों व उनसे उत्पन्न जस्ते व अन्य सामग्री के परिशोधन एवं उपयोग पर प्रकाश डाला। डाॅ. कुंदन माली ने अपने उद्बोधन में कहा कि हिंदी का कथेतर गद्य भारतीय ज्ञान परम्परा व संस्कृति का संवाहक है। इस दौरान हिंदी कथा साहित्य और कथेतर साहित्य से जुड़े विषयों पर कई शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र पढ़े। समापन सत्र का संचालन डाॅ. राजकुमार व्यास ने किया।

साहित्य कला नहीं है, क्योंकि कला सीखी जा सकती है, पर साहित्य सीखा नहीं जाता है

उन्होंने कहा कि साहित्य कला नहीं है, क्योंकि कला सीखी जा सकती है, पर साहित्य सीखा नहीं जाता। साहित्य मौलिकता पर जिंदा रहता है आधुनिकता पर नहीं। समापन सत्र का अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डाॅ. इंदुशेखर तत्पुरुष ने कहा कि सहज स्फूर्ति भाव से ही श्रेष्ठ साहित्य की रचना संभव है। किसी विषय को लेकर दबाव में लिखा गया साहित्य कालजयी नहीं हो सकता। विवेक की कसौटी पर खरा उतरने वाला साहित्य ही लोक मंगलकारी साहित्य हो सकता है। असहमति को भी जगह जरूरी है और विरासत को ग्रहण करने का कोई एक पैटर्न नहीं हो सकता।

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Web Title: रामायण करुणा और महाभारत समझाती है अन्याय का विरोध ही हमारी विरासत है : विजय बहादुर
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