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लोक आस्था के पर्व गणगौर पर शुरू की गई इस सीरीज मेंे आज पढ़िए- लखारा और ब्राह्मण समाज की गणगौर की खासियत

हमें बताएं अपने समाज की गणगौर की खासियत सभी समाज गणगौर महोत्सव मनाने के तौर-तरीकों, गणगौरों से जुड़े रोचक...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 12, 2018, 07:30 AM IST

लोक आस्था के पर्व गणगौर पर शुरू की गई इस सीरीज मेंे आज पढ़िए- लखारा और ब्राह्मण समाज की गणगौर की खासियत
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गणगौर की खासियत

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लखारा समाज की रियासतकालीन गणगौर अब गुलाबी, सजाने का ढंग भी बदला

कम्युनिटी रिपोर्टर | उदयपुर

200 से ज्यादा परिवारों के लखारा (लक्षकार) समाज को मेवाड़ रियासतकाल में महाराणा मेवाड़ से मिली गणगौर भी निराली है। समाज के अध्यक्ष हिम्मतराम लखारा बताते हैं कि लखारा चौक स्थित समाज के चारभुजाजी मंदिर से ही समाज की युवतियां और महिलाएं गणगौर की सवारी निकालती आ रही हैं। खास बात यह है कि यह मंदिर भी महाराणा मेवाड़ ने भेंट किया था, जहां गणगौर और भगवान चारभुजाजी के पूजा स्व. रूपदास वैष्णव ही कराया करते थे। लखारा बताते हैं कि अब गणगौर प्रतिमा के सजाने के ट्रेंड में बदल आया है, क्योंकि पांच वर्ष पहले मोतीचोहट्टा में रियासतकालीन इस काष्ठ प्रतिमा पर गुलाबी रंगरोगन कराया गया ताकि वह सुंदर दिखाई दे। प्रतिमा को राजपूताना ड्रेस से भी सजाने का ट्रेंड है। महिलाओं के सहयोग और जो शाही सवारी निकालने के लिए नव युवक मंडल के युवाओं की टोली हमेशा तत्पर रहती है।

यहां सोसायटी की महिलाएं पूज रहीं गणगौर, महोत्सव की तैयारी

गोवर्धनविलास स्थित लेक गार्डन सोसायटी में करीब 100 परिवारों की महिलाएं रोज गणगौर की पूजा कर रही हैं। डॉ. अंजलि व अन्य ने बताया कि सोसाइटी में गणगौर महोत्सव मनाने की तैयारी चल रही है। महोत्सव के दौरान महिलाओं की विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी। विजेताओं को सम्मानित किया जाएगा। खास बात यह है कि यहां पूरा प्रबंधन महिलाएं खुद ही करती हैं। पुरुष भी मदद कर रहे हैं।

भास्कर की पहल पर ब्राह्मण समाज की महिलाएं पहली बार करेंगी प्रतियोगिताएं

विप्र फाउंडेशन महिला मंच उदयपुर की महिलाएं इन दिनों घर-घर ईसर-गणगौर की पूजा-अर्चना कर रही हैं। मंच की संरक्षक कुसुम शर्मा, अध्यक्ष संगीता व्यास, महामंत्री चित्रा मेनारिया व अन्य बताती हैं कि मंच से जुड़ी ब्राह्मण समाज की हजारों महिलाओं ने दो वर्ष पहले पर्व को धूमधाम से मनाने की अलख जगाई, जो अब मूर्त रूप लेने लगी है। महिलाओं ने दैनिक भास्कर की पहल पर पहली बार अपने-अपने मुहल्लों में होली के बाद से चैत्र शुक्ल तीज तक पूजा-अर्चना के अलावा सामूहिक भागीदारी बढ़ाने विभिन्न कार्यक्रम भी करेंगे। इसके तहत गणगौर गीत-नृत्य आदि पर आधारित प्रतिस्पर्धाएं होंगी। विजेताओं को सम्मानित किया जाएगा। उद्देश्य समरसता बढ़ाना है। वे बताती हैं कि पौराणिक कथाओं के मुताबिक वे जिस जगह गणगौर पूजा करती हैं उसे पीहर (मायका) और विसर्जित करनी वाले स्थल झील, तालाब आदि को मां गौरी का ससुराल कहती हैं।

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