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वृक्ष, जीव और संगीत प्रेमी हैं आदिवासी, इनकी मूल भाषा में नहीं है एक भी स्त्री सूचक गाली : हरीराम मीणा

उदयपुर। पूर्व आईपीएस और आदिवासी मामलों से जुड़े साहित्य के रचनाकार डॉ. हरीराम मीणा ने कहा है कि आदिवासी की भाषा के...

Bhaskar News Network | Last Modified - Feb 02, 2018, 07:45 AM IST

उदयपुर। पूर्व आईपीएस और आदिवासी मामलों से जुड़े साहित्य के रचनाकार डॉ. हरीराम मीणा ने कहा है कि आदिवासी की भाषा के मूल स्वरूप में न तो कोई गाली है और न ही बलात्कार या यौन-अत्याचार के लिए कोई शब्द। क्योंकि आदिवासी समाज की मूल संस्कृति में दुराचार होता ही नहीं है और रिश्ते बनाना स्त्री की आजादी पर निर्भर होता है। इस समाज में कोई गाली स्त्री सूचक नहीं है। मीणा बताते हैं कि उनकी गालियां हैं : तेरे को नाहर उठा ले जाए, तू कुआं में डूब जाए, नदी में बह जाए, नदी में बह जाए, मुझे शक्ल मत दिखाना, लेकिन मां या बेटी को इंगित करके दी जाने वाली कोई गाली नहीं है। मीणा शुक्रवार सुबह सुखाड़िया विवि के दर्शन विभाग के आदिवासियों की ज्ञान मीमांसा संबंधी एक सेमिनार में व्याख्यान के लिए आए हैं। उन्होंने आदिवासियों के कई रोचक पहलू रखे। उन्होंने बताया : आदिवासी सूअर का आखेट करेंगे, लेकिन कम हरिणों का नहीं, क्योंकि वे हरिणों की आत्मा में अपने पूर्वजों का आवास मानते हैं। समुद्र तटीय आदिवासी हरियल कबूतरों की आत्मा में अपने होने वाले शिशुओं का वास मानते हैं। वे दुर्लभ मछलियों का शिकार नहीं करते, क्योंकि उनका विश्वास है कि उनकी आदि जननी की आत्मा का वास इन्हीं मछलियों में हैं।

संगीत ही सब कुछ आदिवासियों का: मीणा ने बताया, आदिवासियों की ज्ञान परंपरा बहुत गहरी है। उनका दर्शन अदभुत है। हर आदिवासी के पास बांसुरी जरूरी होगी। रांची विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति रामदयाल मुुंडा तो राज्यसभा से लेकर यूएनओ तक अपनी बांसुरी साथ रखते रहे। आदिवासी ढोल, नगाड़ा, नौबत, मृदंग या मांदल का प्रयोग करते हैं। लेकिन मांदल उन्हें सबसे प्रिय है। वे सूचना में संगीत की स्वरलहरियों का प्रयोग करते हैं। ढोल को चार तरह बजाते हैं। सांस्कृतिक आयोजन के लिए न्योंते, शोक सूचना, प्राकृतिक प्रकोप और धावा बोलने के लिए भी वे संगीत का ही प्रयोग करते हैं। हमले वाला मारू ढोल होता है। मारू बजने का मतलब है कि घर का सारा सामान बांधकर हमले के लिए चलो।

सामूहिकता का प्रेम: वे बताते हैं, इनका नृत्य चक्रीय होता है। एकल कोई नहीं होता, क्योंकि ये सामूहिकता पर टिके हैं। अकेेलेपन पर नहीं। घूमने की इनकी वृत्ति है, जो इनके जीवन की प्रवृत्ति है। ये आखेट में गति का ध्यान है। इनके पास हर बीमारी का वनोषधियों संबंधी इलाज है। कई विदेशी आदिवासी समाजों में और इनमें बड़ी समानता है। जैसे वे गाय के दूध पर बछड़े का अधिकार मानते हैं, वैसे ही यहां भी होता है।

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