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उदयपुर में बसे जर्मन ने वसीयत में लिखा था हिंदू रीति से हो मेरा अंतिम संस्कार

साल 2000 में घूमने आए थे, यहीं के होकर रह गए, 11 नवंबर को हुआ निधन, मरने से पहले भारतीय दोस्त के नाम लिखी वसीयत

Bhaskar News | Last Modified - Nov 17, 2017, 09:41 AM IST

उदयपुर. जर्मनी के 74 वर्षीय ईसाई नागरिक गुंटूर मारिया पुत्र हैंडी नोरेनबर्ग का अंतिम संस्कार गुरुवार को छह दिन बाद वेदमंत्रों के बीच रानीरोड श्मशानघाट में वैदिक रीति से हो गया। उनकी पार्थिव देह छह दिन तक एमबी अस्पताल की मोर्चरी में जर्मन दूतावास के आदेश का इंतजार करती रही। राज्य का प्रशासनिक अमला और जर्मन दूतावास भी मारिया की वसीयत को लेकर हैरान था, क्योंकि उन्होंने छह महीने पहले ही उदयपुर में अपनी वसीयत कर दी थी कि वे हैं तो ईसाई, लेकिन वे अपना अंतिम संस्कार वैदिक रीति से करवाना चाहते हैं।

मारिया को उदयपुर और यहां के लोगों से बेहद प्रेम था। वे साल 2000 में यहां आए थे और यहीं के होकर रह गए। उनके अंतिम संस्कार से पहले उनकी अंतिम यात्रा राम नाम सत है, सत बोले गत है, के साथ निकाली गई। गुरुवार सुबह जब जर्मन दूतावास का पत्र यहां स्थानीय प्रशासन को मिला तो घंटाघर पुलिस ने मारिया के एमबी अस्पताल की मोर्चरी में रखे शव को रिलीज करवाया।

अंत्येष्टि में राम नाम सत की गूंज

मारिया के मित्र प्रीतम पांड ने बता े या कि कि उन्होंने छह महीने पहले ही संभागीय आयुक्त भवानीसिंह देथा को अर्जी देकर अपना अंतिम संस्कार उदयपुर में हिंदू परंपराओं से करने की गुजारिश की थी। वे पुराने मोहल्ले गणेश घाटी के इला जी का नीम क्षेत्र की एक हवेली में किराए पर रह रहे थे।

चांदपोल स्थित सेवेज गार्डन मेंे मित्र प्रीतम पांड, राकेश े यादव, चंद्रप्रकाश, रणजीतसिंह राव आदि के साथ रेस्टोरेंट चलाते थे। गणगौर घाट पर एक बेकरी कैफे के भी पार्टनर थे। वे कुछ महीनों से कैंसर से पीड़ित थे। जर्मनी लौटने के बजाय आखिरी समय यहीं बिताने की गुजारिश दूतावास से की थी।

अनुमति मिलने पर जनवरी में वे संभागीय आयुक्त से मिले थे। गुरुवार को सौ से अधिक मित्रों ने राम नाम सत की गूंज के साथ उनका अंतिम संस्कार रानी रोड श्मशान में कर्मकांडी पंडित से धार्मिक रीति से मुखाग्नि दिलाकर करवाया।

अंतिम इच्छा पूरी करने को दोस्तों ने 6 दिन मोर्चरी में रखा शव

गुरुवार काे अंत्येष्टि प्रीतम पांड बताते हैं, मारिया एक टूर गाइड थे और 1980 में पहली बार यहां आए। लेकिन वे 2000 के बाद यहीं के होकर रह गए। आठ साल पहले उन्हें कैंसर हो गया था। वे मंदिरों में अक्सर जाते थे। स्थानीय परिवारों से उनका इतना जुड़ाव था कि वे आम तौर पर जानकारों के अंतिम संस्कार और उठावणों में अक्सर दिख जाते थे।

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Web Title: udypur mein bse jerman ne vsiyt mein likhaa thaa hindu riti se ho meraa antim snskar
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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