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खुदाई में मिली थीं राख-चूड़ियां, सरकार ने उसी जगह पर लिखा जौहर स्थल

1958-59 में पुरातत्व विभाग की खुदाई में निकली थी सच्चाई।

Bhaskar News | Last Modified - Nov 16, 2017, 06:07 AM IST

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    चित्तौड़गढ. संजय लीला भंसाली की फिल्म 'पद्मावती' का देशभर में विरोध हो रहा है। इतिहासकार और प्रमुख किताबें जहां रानी पद्मावती के वजूद की बात मानती हैं, वहीं, कुछ ऐसे सबूत भी हैं जो जौहर की सच्चाई को बयां करते हैं। पद्मावती मेवाड़ की महारानी थीं। माना जाता है कि चित्तौड़ में खिलजी के हमले के वक्त अपने सम्मान को बचाने के लिए उन्होंने 1303 में जौहर किया था। मलिक मोहम्मद जायसी ने 1540 में ‘पद्मावत’ लिखी। इससे पहले छिताई चरित, कवि बैन की कथा और गोरा-बादल कविता में भी पद्मावती का जिक्र हुआ था। करीब 60 साल पहले पुरातत्व विभाग ने चित्तौड़गढ़ में खुदाई की थी। इस खुदाई में भी जौहर के सबूत मिले थे।


    जौहर का सबूत: खुदाई में राख-चूड़ियां भी मिलीं
    - 1958-59 में दुर्ग पर बने विजय स्तंभ के पास पुरातत्व विभाग की खुदाई में राख, हडि्डयां और लाख की चूड़ियां मिली थीं। मेवाड़ के इतिहासकार डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू के मुताबिक, पुरातत्व विभाग ने वेस्ट जोन सुपरिटेंडेंट एस सुब्बाराव के निर्देशन में विजय स्तंभ के पास खुदाई की थी।
    - जुगनू बताते हैं- खुदाई में एक कुंड मिला। इसमें से मिटटी, राख और कुछ हडि्डयां मिलीं। तीन लाइन की इस रिपोर्ट में विभाग ने इससे ज्यादा कुछ नहीं लिखा।

    खुदाई वाली जगह को जौहर स्थल घोषित किया गया
    - भास्कर ने इसकी पुष्टि के लिए गाइड और फोटोग्राफर केके शर्मा से बातचीत की। उन्होंने बताया कि उस अभियान के गवाह उनके पिता बंशीलाल शर्मा थे।
    - शर्मा के मुताबिक, उनके पिता भी बताते थे कि विजय स्तंभ के पास खुदाई के दौरान राख, हडि्डयां और चूड़ियां मिलीं। इसकी जांच के बाद ही पुरातत्व विभाग ने इसे जौहर स्थल घोषित किया। बाद में जौहर संस्थान ने यहां हवन कुंड बनवाया।
    - शर्मा ने कहा कि इसी परिसर में प्राचीन समिद्वेश्वर महादेव मंदिर की पिताजी पूजा करते थे। वे गाइड भी थे। खुदाई के समय यह मंदिर 15 फीट मिट्टी में दबा था। साफ-सफाई के बाद नए सिरे से पूजा-अर्चना शुरू हुई।
    - खुदाई वाले स्थान पर अब पुरातत्व विभाग का बोर्ड भी लगा है। दुर्ग अब विश्व विरासत है। इसलिए पुरातत्व विभाग ही यहां निर्माण करा सकता है या सूचना, बोर्ड आदि लगा सकता है।

    महज कल्पना नहीं है पद्मावती
    - हिस्ट्री रिसर्चर और चित्तौड़ पीजी कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल डाॅ. ए.एल. जैन कहते हैं कि जो लोग पद्मिनी के इतिहास को मात्र मोहम्मद मलिक जायसी का काव्य कहकर खारिज करते हैं, वे सही नहीं हैं। यह महज कल्पना होती तो जायसी के कथानक में सभी किरदार वे ही नहीं होते, जो बाकी इतिहासकार मानते हैं। मेवाड़ के इतिहासकार रामवल्लभ सोमाणी ने अपनी किताब में जिक्र किया है कि भारतीय पुरातत्व विभाग की खुदाई में गढ़ पर राख और हडि्डयां निकली थीं।

    जायसी की पद्मावत के अलावा 11 किताबों में है पद्मावती का जिक्र
    - हिंदी की प्रोफेसर डॉ. सुशीला लड्ढा बताती हैं कि लब्धोदय कृत पद‌्मिनी चरित, हेमरतन लिखित गोरा-बादल, पद‌्मिनी चौपाल, डाॅ. जीएन शर्मा लिखित राजस्थान का इतिहास भाग प्रथम, डाॅ. दशरथ शर्मा की ‘राजस्थान थ्रू द एजेज’ में पद्मिनी, गोरा-बादल और रावल रनतसिंह के घटनाक्रमों का उल्लेख है।
    - उन्होंने बताया कि नैणसीरी ख्यात, कर्नल जेम्स टॉड की किताब, तारीखे फरिश्ता और राज प्रशस्ति आदि में भी पद‌्मिनी का जिक्र है। मुनि जिनविजयजी ने हेमरतन की रचना का शोध लेख लिखा था। इसमें रावल रत्नसेन, पद‌्मिनी, गोरा-बादल, रावल चेतन को ऐतिहासिक पात्र कहा गया है। इससे पूर्व विक्रम संवत 1583 की छिताई वार्ता में लिखा है..... यौ बोले दिल्ली को धणी, मै चित्तौर सुनी पद्मिनी। बाद्यो रतनसेन मै जाई, तो गौ-बादिलु ताहि छुड़ाई।
    - डाॅ. लड्ढा कहती हैं- 16वीं सदी के कवि मलिक मोहम्मद जायसी ने पद्मावत में उल्लेख किया कि उन्होंने लौकिक कथा से ही आध्यात्मिक रूपक रचा है।

    पहला विवाद : क्या हकीकत में थीं रानी पद्मावती?
    - वे कोरी कल्पना नहीं थीं। रानी पद्मावती ने 1303 में जौहर किया। मलिक मोहम्मद जायसी ने 1540 में ‘पद्मावत’ लिखी। छिताई चरित, कवि बैन की कथा और गोरा-बादल कविता में भी पद्मावती का जिक्र था।

    दूसरा विवाद : क्या जायसी ने हकीकत के साथ कल्पना जोड़ी?
    इसी पर डिबेट है। कई इतिहासकार कुछ हिस्सों को कल्पना मानते हैं। जायसी ने लिखा कि पद्मावती सुंदर थीं। खिलजी ने उन्हें देखना चाहा। चित्तौड़ पर हमले की धमकी दी। रानी मिलने के लिए राजी नहीं थीं। उन्होंने जौहर कर लिया।

    तीसरा विवाद : खिलजी हीरो नहीं था
    चित्तौड़गढ़ के जौहर स्मृति संस्थान का कहना है- फिल्म में हमलावर खिलजी को नायक बताया है। जबकि राजा रतन सिंह की अहमियत खत्म कर दी है। यही इतिहास से छेड़छाड़ है।

    चौथा विवाद : घूमर नृत्य नहीं, सम्मान
    फिल्म के एक गाने में घूमर नृत्य दिखाया है। राजपूतों के मुताबिक, घूमर अदब का प्रतीक है। रानी सभी के सामने घूमर कर ही नहीं सकतीं।

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    दुर्ग में जिस जगह खुदाई में हड्डियां और चूड़ियां मिलीं, उसे पुरातत्व विभाग ने जौहर स्थल घोषित किया है।
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    दावा किया जाता है कि इस कुंड में रानी ने किया था जौहर।
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    आज भी किले में बिखरे हुए हैं कई सबूत।
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    किले के परिसर में ऐसे कई कुंड आज भी हैं मौजूद।
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    दावा किया जाता है कि इसी आईने में खिलजी ने देखा था रानी को।
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    चित्तौड़ के किले में मौजूद शिलालेख।
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