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UGC का सिस्टम फेल, ऑफ कैम्पस स्टडी सेंटरों को जांचा तक नहींं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को देश के डीम्ड संस्थानों पर लगाम कसने के मामले में पूरी तरह फेल करार दिया है।

निखिल शर्मा | Last Modified - Nov 05, 2017, 09:18 AM IST

UGC का सिस्टम फेल, ऑफ कैम्पस स्टडी सेंटरों को जांचा तक नहींं: सुप्रीम कोर्ट
उदयपुर.सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को डीम्ड यूनिवर्सिटी के खिलाफ दिए फैसले में यूजीसी को देश के डीम्ड संस्थानों पर लगाम कसने के मामले में पूरी तरह फेल करार दिया है। कोर्ट ने कहा है कि इस तरह की चीजों से गंभीर सवाल खड़े होते हैं कि यूजीसी ने लाखों ऑफ कैम्पस स्टडी सेंटरों को जांचा तक नहीं और आंख मूंदकर लाखों छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ होने दिया। कोर्ट ने तल्ख टिप्‍पणी करते हुए कहा कि यूजीसी के सिस्टम की नाकामी है कि शिक्षण संस्थान बिना अनुमति डिग्रियां देते रहे और यूजीसी देखता रहा, एेसे में यूजीसी के होने नहीं होने का कोई अर्थ दिखाई नहीं पड़ रहा है। राजस्थान विद्यापीठ सहित देश के 4 संस्थानों पर शुक्रवार को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर भास्कर ने पड़ताल की तो कोर्ट के कई अहम निर्णय सामने आए। कोर्ट के इस फैसले का बड़ा असर विद्यापीठ से जुड़े हजारों लोगों पर पड़ेगा।
20 से 25 हजार की जा सकती हैं नौकरियां
कोर्ट के फैसले से राजस्थान विद्यापीठ से डिग्री लेने वाले 20 से 25 हजार लोगों की नौकरियां जा सकती हैं। 17 सालों में लगभग 50 से 70 हजार लोगों ने विद्यापीठ से डिस्टेंस एजुकेशन के तहत इंजीनियरिंग की डिग्रियां ली हैं। ऐसे में इनमें से लगभग 20 से 25 हजार लोग देशभर की यूनिवर्सिटी-कॉलेज और विभिन्न कम्पनियों में काम कर रहे हैं।
कोर्ट के फैसले का ये होगा असर
- 20 से 25 हजार नौकरियां के अतिरिक्त जो लोग 2001 से 2005 के दायरे में अा रहे होंगे उन्हें एआईसीटीआई के टेस्ट के लिए रुकना होगा। ऐसे में उनकी पदोन्नतियों पर भी रोक लग जाएगी।
- प्राइवेट यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में पढ़ा रहे शिक्षकों की नौकरी जाएगी।
- निकट भविष्य में कई यूनिवर्सिटी में इंटरव्यू होने हैं ऐसे में यह फैसला आने के बाद 500 से ज्यादा लोग इंटरव्यू नहीं दे पाएंगे।
- विद्यापीठ का फिक्स्ड डिपोजिट लगभग 50 करोड़ है वहीं विवि को लगभग 500 करोड़
रूपया चुकाना होगा, ऐसे में विद्यापीठ में काम करने वाला 400 लोगों का परमानेंट और 200 अस्थाई स्टाफ के भविष्य पर भी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं।
- कोर्ट ने यह भी कहा है कि भविष्य में विद्यापीठ की मान्यता रहेगी या नहीं, यह जांच के बाद निर्णय होगा। ऐसे में अगर विद्यापीठ की मान्यता रद्द होती है तो इससे जुड़े लगभग 5500 से ज्यादा छात्रों का करियर अधरझूल में लटक सकता है।
- कुछ समय पूर्व नैक ने विद्यापीठ को ए ग्रेड संस्थान माना है। कोर्ट ने विद्यापीठ की बड़ी संख्या में डिग्रियां निरस्त की है। वहीं दूसरी ओर संस्थान में शिक्षकों की अनुपलब्धता, रिसर्च में पेपर नहीं होना, इंफ्रास्ट्रक्चर पर्याप्त नहीं सहित कई पहलुओं में कमजोर होने के आरोप लगे हैं। ऐसे में नैक से मिली ए ग्रेड पर भी सवाल उठ रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में ये भी
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विद्यापीठ ने एआईसीटीई से अप्रूवल लिए बिना यूजीसी को कोर्स के लिए पत्र लिख दिया। वहीं यूजीसी की स्वीकृति को मेन्युप्लेट करके इंजीनियरिंग और टेक्नीकल कोर्स को चलाया। कोर्ट के दखल के बाद यूजीसी ने स्पष्ट किया कि विद्यापीठ को इस तरह के कोर्स चलाने का अधिकार नहीं है।
- कोर्ट ने फैसले में माना कि 2005 के बाद विवि ऑफ कैम्पस सेंटर नहीं चला सकता था इसके बावजूद 2016-17 तक ऑफ कैम्पस सेंटर में ही विद्यापीठ परीक्षा कराता रहा जो कि गंभीर गलती है।
- एआईसीटीआई की पॉलिसी है कि इंजीनियरिंग सहित कई कोर्स को डिस्टेंस कराने की अनुमति नहीं देती है, ऐसे में एआईसीटीई से अनुमति लिए बिना ही विद्यापीठ ने कोर्स चला लिए।
- कोर्ट ने एमएचआरडी की एक रिपोर्ट का हवाला भी दिया है जिसमें कहा गया है कि विद्यापीठ ने 295 से ज्यादा कोर्स शुरू कर लिए और उसके बाद अनुमति मांगी जबकि ये सारे कोर्स चलाने के लिए विद्यापीठ वैद्य नहीं है।
- कोर्ट ने अपने फैसले में यह तर्क भी दिया कि यूजीसी ने 2013 को एक निर्देश जारी कर कहा था कि विद्यापीठ को सिर्फ सोशल वक्स, आर्टस, एजुकेशन और कॉमर्स के ही कोर्स चला सकता है, इसके बावजूद विद्यापीठ ने अन्य कोर्सेज चलाए।
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